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काशी विश्वनाथ मंदिर: 21 साल में हुई थीं पांच चोरियां, 1983 की घटना सबसे चर्चित; दस्तावेजों में दर्ज है इतिहास

Fri, 10 Jul 2026 09:35 AM IST
Pragati Chand राहुल दुबे, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।
राहुल दुबे, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 10 Jul 2026 09:35 AM IST
सार

Varanasi News: काशी विश्वनाथ मंदिर में 21 साल में पांच चोरियां हुई थीं। इनमें 16 लाख रुपये के आभूषण चोरी का मामला ही दर्ज हुआ। चार चोरियों का मामला रफा-दफा कर दिया गया था। 1983 में हुई चोरी के बाद सरकार ने मंदिर का अधिग्रहण किया था। 

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Kashi Vishwanath Temple Five thefts occurred over 21 years 1983 incident most high-profile in varanasi
काशी विश्वनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी के विवाद के बीच ही काशी विश्वनाथ मंदिर में पुरानी चोरियों की चर्चा होने लगी है। मंदिर न्यास के एक्ट में 1962 से 1983 के बीच यानी 21 साल में पांच बड़ी चोरियों का जिक्र है लेकिन इनमें से 4 जनवरी 1983 को हुई चोरी का मामला ही पुलिस तक पहुंचा था। इसमें 16 लाख रुपये के आभूषण चोरी किए जाने का ब्योरा दिया गया था। चार चोरियों का मामला रफा-दफा कर दिया गया था। चोरियों और अव्यवस्था की वजह से ही मंदिर की आर्थिक हालत खराब हो गई थी। नतीजा रहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) को पत्र लिखकर स्वर्ण जड़ित अरघे के लिए छह लाख रुपये का ऋण लेना पड़ा था।
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देशभर के श्रद्धालुओं को झकझोर दी थी ये घटना
चार जनवरी 1983 की रात श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में चोरी ने देशभर के श्रद्धालुओं को झकझोर कर रख दिया था। चोर शिवलिंग के स्वर्ण जड़ित अरघे को काट ले गए थे। पूजा में इस्तेमाल होने वाले बर्तन भी साथ ले गए थे। यह मंदिर में पांचवीं सबसे बड़ी चोरी थी। तत्कालीन सरकार की चिंता महज चोरी के आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं थी बल्कि बाबा विश्वनाथ के स्वर्ण जड़ित अरघे को दोबारा उसी रूप में स्थापित करने की थी।
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स्वर्ण जड़ित अरघे के लिए लेना पड़ा था छह लाख रुपये का ऋण
एक फरवरी 1983 को वाराणसी के तत्कालीन मंडलायुक्त शैवाल मुखर्जी ने यूपी के मुख्य सचिव को पत्र लिखा था। मंडलायुक्त ने कहा था कि श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के स्वर्ण जड़ित अरघे को शिवरात्रि से पहले बनवाना जरूरी है। श्रद्धालुओं में गुस्सा है। श्रद्धालुओं का विश्वास जीतने के लिए अरघे को स्वर्ण जड़ित कराना ही होगा। इसके लिए छह लाख रुपये की जरूरत है। उन्होंने आरबीआई को पत्र लिखने और ऋण लेने का सुझाव भी दिया था। इस पर तत्कालीन मुख्य सचिव ने मामले को आगे बढ़ाया। पांच जनवरी से पुलिस की जांच तेज हो गई थी। 


25 जनवरी 1983 को अमर उजाला में छपी खबर

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नहीं हो सका था चोरी का खुलासा
वाराणसी के साथ ही आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों में दबिश दी गई थी। मंदिर के कर्मचारियों और पुजारियों से पूछताछ की गई थी। सुरक्षा व्यवस्था की जांच हुई थी, लेकिन चोरी का खुलासा नहीं हो सका था। इसी तरह 1962, 1969, 1976 और 1982 में हुई चोरियों का जिक्र तो है लेकिन कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। चोरियां हुई थीं, बस इतनी ही जानकारी न्यास के एक्ट में दी गई है।
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चोरी के 21 दिन बाद मंदिर का अधिग्रहण, न्यास परिषद के अध्यक्ष बनाए गए काशी नरेश
4 जनवरी 1983 में हुई चोरी के 21 दिन बाद यानी 25 जनवरी को ही तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लिया था। सरकार ने अध्यादेश जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर का अधिग्रहण कर लिया था। साथ ही मंदिर के संचालन की नई व्यवस्था लागू कर दी थी। तीन स्तरीय प्रबंधन का प्रावधान किया गया था। इनमें एक न्यासी परिषद, एक कार्यकारिणी समिति और एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी का प्रावधान शामिल था। पहला न्यास अध्यक्ष काशी नरेश विभूति नारायण सिंह का बनाया गया था। शृंगेरी के शंकराचार्य, सांस्कृतिक, वित्त, समाज कल्याण विभाग, न्यायिक विभाग के सचिव, सांस्कृतिक कार्य निदेशक, डीएम, मंडलायुक्त, संपूर्णानंद संस्कृत विवि के कुलपति को सदस्य बनाया गया था।

1983 में तो चोरी हुई ही थी। 70 के दशक में भी चोरी हुई थी। पुलिस पड़ताल में कोई एक व्यक्ति पकड़ा भी गया था। इस तरह की घटनाएं सार्वजनिक स्थानों पर न हों इसके लिए सरकारी तंत्र काम करता है। करना भी चाहिए इसीलिए काशी विश्वनाथ में 1983 में जब बड़ी चोरी हुई तो प्राथमिकी दर्ज की गई। संतों और जनता की नाराजगी बढ़ी तो सरकार ने मंदिर के अधिग्रहण की घोषणा कर दी। बाकी काम, क्रोध, लोभ और मोह तो इंसानी प्रवृत्ति है चाहे वह सामान्य आदमी हो या किसी बड़े पद पर बैठा कोई भी विशिष्ट व्यक्ति इसीलिए निगरानी तंत्र को हमेशा सक्रिय रहना चाहिए। -प्रो. नागेंद्र पांडेय, पूर्व अध्यक्ष, काशी विश्वनाथ न्यास

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