UP: बेटे के सपनों को ट्रॉली खींचकर सजाया, बीमारी आई तो घर से बेघर हो गए मंजू दत्त; अमन को देख छलक पड़े आंसू
Varanasi News: मंजू दत्त की यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की पीड़ा नहीं है, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक आईना भी है। यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या सच में हमारे समाज में बुजुर्गों के लिए सम्मान और सहारा कम होता जा रहा है?
विस्तार
लालपुर इलाके के रहने वाले करीब 60 वर्षीय मंजू दत्त की कहानी आज समाज के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा करती है, जो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर देता है। जिंदगी भर जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी जवानी खपा दी, उसी बेटे के घर से आज वह बेघर होकर अस्पताल की चौखट पर आ गए हैं।
मंजू दत्त का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने अपनी पूरी जवानी ट्रॉली चलाकर गुजारी। दिन-रात मेहनत करके उन्होंने अपने परिवार का पेट पाला। कड़ी धूप हो या कड़कड़ाती ठंड, मंजू दत्त हर दिन सड़क पर निकलते थे, ताकि घर में चूल्हा जल सके। उनकी सबसे बड़ी तमन्ना थी कि उनका इकलौता बेटा पढ़-लिखकर अच्छा जीवन जी सके।
उन्होंने बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। अपनी छोटी-छोटी बचत से गहने भी इकट्ठा किए और जब बेटे की शादी का समय आया तो पूरे अरमानों के साथ उसका विवाह धूमधाम से किया। मंजू दत्त के लिए उनका बेटा ही उनकी दुनिया थी। उन्हें लगता था कि बुढ़ापे में यही बेटा उनका सहारा बनेगा, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।
कुछ समय पहले मंजू दत्त को आंख में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ने घेर लिया। धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। इलाज के लिए पैसे और देखभाल की जरूरत थी। उन्हें उम्मीद थी कि उनका बेटा इस कठिन समय में उनके साथ खड़ा होगा, परंतु मंजू दत्त की उम्मीदें उस दिन टूट गईं, जब उनके बेटे और बहू ने साफ शब्दों में कह दिया कि वे उनके इलाज का खर्च नहीं उठा सकते। इतना ही नहीं, उन्हें घर छोड़ने के लिए भी कह दिया गया।
यह सुनकर मंजू दत्त की आंखों से आंसू बह निकले। जिस बेटे को उन्होंने अपने खून-पसीने से पाला था, उसी के घर में आज उनके लिए जगह नहीं बची थी। फिर भी उन्होंने अपने बेटे के लिए मन में कोई शिकायत नहीं रखी। भारी मन और भीगी आंखों के साथ उन्होंने बेटे को आशीर्वाद दिया और चुपचाप घर से निकल पड़े।
अब मंजू दत्त मंडलीय अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उनके चेहरे पर दर्द तो साफ दिखाई देता है, लेकिन बेटे के लिए दुआएं अब भी कम नहीं हुई हैं। वह कहते हैं कि “बेटा खुश रहे, यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है।”
सामाजिक कार्यकर्ता अमन कबीर जब इस होली पर मंजू दत्त से मिले तो उन्होंने अपना दर्द बयां किया। अमन की मां भी मंजू की कहानी सुनकर निराशा हो गईं। अपनी कहानी बताते-बताते मंजू नाराज भी हुए। कहा कि मेरी वीडियो बनाकर वायरल करो, ताकि बेटे को उसकी करनी का पता चले। अमन और उनकी मां ने मंजू को कपड़े दिए। इस पर उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
जिंदगी भर बेटे के भविष्य को संवारने में लगे मंजू दत्त आज बीमारी और अकेलेपन से जूझ रहे हैं। उनकी आंखों में दर्द के साथ-साथ अब भी एक उम्मीद झलकती है-शायद किसी दिन उनका बेटा उन्हें फिर से गले लगा ले।
