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मसाने की होली: बीच का रास्ता निकालिए, काशी के इस आयोजन को बंद कराने की बात मत करिए; पक्ष-विपक्ष में तर्क

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Thu, 26 Feb 2026 12:08 PM IST
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सार

Varanasi News: वाराणसी में मसाने की होली पर पक्ष-विपक्ष में तर्क हुआ। इस दौरान किस अधिकार से रोकें, किस आधार पर चला रहे को लेकर बातचीत हुई।वहीं धर्माचार्य, आयोजक और बुद्धिजीवियों ने अमर उजाला कार्यालय में किए संवाद में बीच का रास्ता निकालने की मांग की। 

Masan holi 2026: Arguments for and against Holi celebrations at crematorium in Varanasi
धर्माचार्य, आयोजक और बुद्धिजीवियों ने अमर उजाला कार्यालय में किए संवाद में बीच का रास्ता निकालने की - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाने वाली मसाने की होली को लेकर विवाद और बढ़ गया है। आयोजकों का पक्ष इसे काशी की विशिष्ट परंपरा बता रहा है तो दूसरा शास्त्रसम्मत आधार पर सवाल खड़े कर रहा है। मर्यादा, महिलाओं की भागीदारी, भस्म के प्रयोग और भीड़ प्रबंधन जैसे मुद्दों पर बात हो रही है। अमर उजाला के कार्यालय में बुधवार को इन्हीं सब मुद्दों पर बात हुई। कुछ ने बीच का रास्ता निकालने की बात की तो कुछ लोगों ने कहा कि बीच का कोई रास्ता नहीं है। संवाद में आयोजक, धर्माचार्य, ज्योतिष, समाजसेवी और विद्वानों ने हिस्सा लेकर बात रखी।

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मसाने की होली हमारे शास्त्रों में नहीं है, वह हमारा अतीत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जो होता है उसमें लोक वाली चलती है या शास्त्र वाली। पूरा पूरब शब्दों का गलत उच्चारण करता है, तो क्या हम पूरे समाज को डंडा लेकर मारने दौड़ेंगे। नहीं...। दौड़ना भी नहीं चाहिए। बीच का रास्ता, शास्त्र सम्मत रास्ता निकालना चाहिए। दो दशक में ही मसाने की होली खड़ी हो गई और अब उत्सव बन गई।
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अब सवाल यह है कि हम किस अधिकार से रोक रहे हैं और किस अधिकार से चला रहे हैं। मसाने की होली से जो शिकायतें हैं उन्हें दूर करना होगा। शास्त्रसम्मत हल तलाशना होगा। त्योहार को बनारसी बनाइए और गैर बनारसी तत्व को छोड़ना होगा। उस त्योहार को देश निकाला मत कहिए, उसे अपना बनाइए। -व्योमेश शुक्ला, प्रधानमंत्री, नागिरी प्रचारिणी सभा

एक समय में लोग मणिकर्णिका घाट की ओर देखना पसंद नहीं करते थे। मैं उसी गली में पैदा हुआ हूं। हमारे यहां पूजा का समान भी उसी गली से आता है। शवयात्रियों से सामान छू जाता था। हमने उसे छूत नहीं माना क्योंकि वह मार्ग मंगलकारी है। मिट्टी उठाकर हमने भस्म कह दिया तो वही माना जाता है। पहले बहुत छोटे स्तर पर होता था, जब प्रचार प्रसार हुआ तो भीड़ बढ़ने लगी तो लोगों को लगा यह त्योहार भी है। आज श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन को लोग आने वाले लोग मणिकर्णिका जरूर जाते हैं। मंदिर कमेटी से जुड़े 15 लोग और 50 से अधिक लोग भस्म अर्पित करते हैँ और प्रसाद बांटते हैं। हम अपनी सीमा और परिधि से बाहर नहीं जाते हैं। -गुलशन कपूर, व्यवस्थापक, बाबा महाश्मशाननाथ मंदिर

मणिकर्णिका पर इतने विद्वान बोल रहे हैं लेकिन प्रयागराज में जब शिखा खींची गई तो कोई क्यों नहीं बोला। अब धर्म की बात कर रहे हैं। मसाने की होली बहुत प्राचीन हैं। -राजीव उपाध्याय

यह बहुत पुराना कार्यक्रम है। अगर मसाने की होली चिता है तो होली पर होलिका माई क्या हैं। तब सभी होलिका माई के जयकारे लगाते हैं और राख से तिलक करते हैं। -विजय शंकर पांडेय

सभी की पूजा पद्धति अलग है। अघोर समाज अलग तरह से पूजा करता है। हम चिता की भस्म अर्पित करते हैं। मेरा कहना यह है सभी से कि मसाने की होली को होने दिया जाए। -सोमनाथ अघोरी

यह बड़े स्तर का कार्यक्रम है। लोगों को रोकना तो स्मार्ट फैसला नहीं है। अगर प्रयाग में करोड़ों लोगों का प्रबंधन हो सकता है तो मसाने की होली पर क्यों नहीं हो सकता है। यह मसान की होली अनोखी चीज है, जो सिर्फ काशी में हैं। इसे रोका नहीं जाना चाहिए। -शालिनी, बीएचयू छात्रा

दो पूजा व्यवस्था है। शास्वत और तामसिक। समय परिवर्तन के साथ तरीके बदलते हैं। काशी के लोगों ने अंगीकार किया तभी तो इतना आगे बढ़ा। आज बंद करने की बात हो रही है लेकिन 20 साल पहले क्यों नहीं रोका गया आज इस पर क्यों बात हो रही है। महिलाओं को भी मसान में जाने का तरीका है। हां वहां कुछ विकृत नहीं होना चाहिए। कुछ बीच का रास्ता निकालिए, बंद होने पर चर्चा मत करिए। मान्यताएं हैं तो उनका पालन होना चाहिए। -भानू मिश्रा

आयोजक को इस बात का ध्यान देना चाहिए वहां गलत काम हो रहे हैं उन्हें रोकना चाहिए। अमर्यादित काम रोकना भी आपका ही काम है। मसान की होली में जो अमर्यादित कृत्य होते हैं तो काशी की छवि खराब करते हैं तो कुछ नियम बनाइए। दिशा निर्देश बनाया जाए। शास्त्र सम्मत बात करें तो महिलाओं का श्मशान जाना वर्जित है लेकिन इस पर रास्ता निकालिए कि दूर से देख सकते हैं क्या। सीधी बात इतनी कि इसका दायरा तय किया जाए, मर्यादा और धर्म की आड़ में कोई भी अमर्यादित काम न हो। -कल्लू महाराज

काशी सभी युगों में थी आगे भी रहेगी। काशी में सभी देव मूल रूप में हैं। पहले तो यह समझ लें कि मणिकर्णिका शास्त्रों में श्मशान नहीं है। यह जलेसर घाट है। मणिकर्णिका परम पुण्यतीर्थम, तीर्थों का सुप्रीम कोर्ट है। 1762 में यहां पहली चिता जली। यहां कुछ औघड़ और कर्मचारी पूजन करते थे। यह कपड़ा फाड़ना, नशा करना और गांजा पीकर पड़े रहना इसे ऐसा मनोरंजन केंद्र बन गया है। क्रिएटिव के चक्कर में धर्म खत्म कर देंगे। होली वाले दिन ही होली होती है और ढुंढा देवी का पूजन होता है। -मनीष नंदन मिश्रा, पुरोहित सभा
 
श्मशान में क्रंदन है, रुदन है। वहां हुड़दंग करेंगे हम। चिता की राख को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। मुर्दे की भस्म से कहीं पूजा नहीं होती। मैं उज्जैन में यही पता करने गया। महाकालेश्वर मंदिर समिति से बात की तो उन्होंने बताया कि उपले की राख से आरती होती है। खुद सोचिए कि चिता की भस्म से होली खेलेंगे, उसे घर कैसे लेकर जाएंगे। मिट्टी से भी होकर आते हैं कि घर में शुद्ध होकर घर में जाते हैं। यह परंपरा नहीं हैं। यह सामाजिक दृष्टिकोण से भी ठीक नहीं है। भस्म से होली खेलना ठीक नहीं है, आपको बंद नहीं करना है तो भस्म से लोगों को तिलक कर दीजिए, वह घर जाएं। -प्रो. चंद्रमौलि उपाध्याय 

बात हो रही है कि बीच का रास्ता निकाला जाए। मसाने की होली पर बीच का रास्ता नहीं हो सकता। काशी केयरलेस नहीं है केयर फ्री है। दिवंगत छन्नू लाल मिश्र भी दिगंबर में खेले होली... सभ्य मंचों पर, घरों में गाया। मणिकर्णिका पर बैठकर नहीं गाया। काशी के मूल चरित्र को जानने के लिए उसको पढ़ना जरूरी है। शिव का दूसरा नाम है अघोर। अघोर माने भय के उस पार ले जाने का नाम है अघोर। काशी की बीमारी यह है कि कुछ भी नया करें लेकिन नाम प्राचीन होना चाहिए। पंचगंगा पर नरगिस की माताजी गाती थीं। 600 साल पहले बनारस का भूगोल क्या है यही नहीं पता है लोगों को। इस शहर में नौ टोला था मुक्त विवि था। पारिवारिक लोगों का आना शुरू हुआ 15वीं शताब्दी के बाद, उत्सव मनाने की परंपरा बहुत बाद में हैं। अहिल्याबाई की कृपा से लोगों ने उत्सव मनाना शुरू किया। मणिकर्णिका पर सेल्फी ले रहे हैं यह शिव का अपमान है। हमें दूसरों की आस्था को चोट करने का अधिकार नहीं है। काशी में सबकुछ बहुत प्राचीन है ऐसा झूठ मत गढि़ए। यह एक नाम पर कायम नहीं रहा, 32 नाम है, हर कालखंड में नाम बदला है। -अमिताभ भट्टाचार्य, वरिष्ठ पत्रकार 
 
मौजूदा परिस्थितियां ऐसी नहीं है कि घाट पर भीड़ को इकठ्ठा किया जा सके। मैंने नगर निगम को पत्र लिखा है कि वहां निर्माण कार्य चल रहा है। ऐसे में वहां क्या कार्यक्रम हो सकता है। वहां खोदाई हुई है, सरिया खुले में पड़ी है। किसी की जान से खिलवाड़ नहीं कर सकते। मैं इतना साफ कह रहा हूं कि पूर्व में जिस तरह से होता रहा है कार्यक्रम, उतना संभव नहीं हो पाएगा। महिलाएं जाएंगी या नहीं जाएंगी यह धर्म का विषय है लेकिन मैं सभी को सुरक्षा की गारंटी देता हूं। हुड़दगंई नहीं होने दी जाएगी। -अतुल अंजान, एसीपी

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