Varanasi Court: दो बार पर रास्ते अलग, BBA विस्तार तो CBA स्थानांतरण के पक्ष में; सालाना बढ़ रहे 1000 अधिवक्ता
Varanasi News: वाराणसी में बढ़ती अधिवक्ताओं की संख्या को लेकर बार संगठनों की राय अलग-अलग है। सालाना करीब 1000 नए अधिवक्ता जुड़ने से न्यायालय परिसर में जगह की कमी बढ़ रही है। बीबीए वर्तमान परिसर के विस्तार के पक्ष में है, जबकि सीबीए अदालत परिसर के स्थानांतरण को बेहतर समाधान मान रही है।
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विस्तार
Varanasi District Court: समय के साथ कचहरी में मुकदमों और अधिवक्ताओं की संख्या लगातार बढ़ती गई, लेकिन मूलभूत सुविधाओं का विस्तार उसी अनुपात में नहीं हो सका। नतीजा यह है कि लगभग 10 हजार अधिवक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने में वर्तमान कचहरी परिसर अब छोटा पड़ने लगा है।
बैठने की पर्याप्त व्यवस्था, पार्किंग, पेयजल, शौचालय और वादकारियों के लिए आवश्यक सुविधाओं का अभाव लंबे समय से महसूस किया जा रहा है। युवा अधिवक्ताओं को चेंबर और बैठने तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसी समस्या के स्थायी समाधान को लेकर वाराणसी की दोनों प्रमुख बार एसोसिएशन आमने-सामने हैं।
सेंट्रल बार एसोसिएशन (सीबीए) शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल की जमीन पर इंटीग्रेटेड कचहरी बनाकर पूरे न्यायालय परिसर के स्थानांतरण का पक्षधर है। इसके लिए पदाधिकारियों ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर प्रस्ताव भी सौंपा है।
दूसरी ओर, बनारस बार एसोसिएशन (बीबीए) स्थानांतरण का विरोध करते हुए वर्तमान कचहरी के आसपास उपलब्ध भूमि, विशेषकर बनारस क्लब की जमीन, उद्यान विभाग और डीएम कंपाउंड को लेकर यहीं परिसर का विस्तारीकरण कराने की मांग कर रही है। सेंट्रल बार एसोसिएशन का तर्क है कि सालाना 600 से 1000 अधिवक्ताओं की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में अब कचहरी का स्थानांतरण होना चाहिए और इंटीग्रेटेड कचहरी के लिए सेंट्रल जेल की जमीन उपयुक्त है।
बनारस क्लब, उद्यान विभाग और कमिश्नरी की 20 बीघा जमीन पर कचहरी का विस्तारीकरण किया जाना चाहिए। कचहरी का अपना इतिहास है। ऐसे में कचहरी के आसपास मौजूद जमीन पर ही विस्तारीकरण हो, न कि स्थानांतरण की बात हो। सत्ताधारी दल की मिलीभगत से अधिवक्ताओं को कमजोर करने का काम किया जा रहा है। - विनोद कुमार शुक्ला, अध्यक्ष, बनारस बार एसोसिएशन
बनारस क्लब का मामला 15 साल से कोर्ट में लंबित है। उद्यान विभाग की जमीन पर निर्माण संभव नहीं है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ चंदेल यहां आए थे। यहां की समस्याओं को देखते हुए उन्होंने अपने विचार रखे थे। सेंट्रल जेल के पास 25 एकड़ जमीन है। पुरानी कचहरी से महज 500 मीटर की दूरी है। - प्रेम प्रकाश सिंह गौतम, अध्यक्ष, सेंट्रल बार एसोसिएशन
कचहरी का प्रश्न मतभेद नहीं, समाधान का विषय है। बढ़ती आबादी, युवाओं की जरूरतों और भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए स्थानांतरण हो या विस्तार, जो भी निर्णय लिया जाए, वह सभी पक्षों की सहमति, जनहित, न्यायिक सुविधा और दीर्घकालिक विकास को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। - विकास सिंह, अधिवक्ता (फौजदारी)
बनारस क्लब की जमीन उपयोगी है। कमिश्नरी के पास भी पर्याप्त जमीन है। यहां सड़कों के जुड़ाव के साथ सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं। सेंट्रल जेल की जमीन देने से जेल प्रशासन पहले ही इनकार कर चुका है। इसके लिए महानिदेशक कारागार की अनुमति आवश्यक है। - श्रीनाथ त्रिपाठी, सदस्य, बार काउंसिल ऑफ इंडिया
कचहरी का वर्तमान स्वरूप देखते हुए यहां विस्तार की बात संभव नहीं है। हर साल अधिवक्ताओं की संख्या बढ़ रही है। अगर सेंट्रल जेल की जमीन पर इंटीग्रेटेड कचहरी के लिए सकारात्मक पहल हो रही है, तो इसका स्वागत करना चाहिए। क्या पता भविष्य में कचहरी शहर से काफी दूर चली जाए। फिर मलाल ही हाथ लगेगा। - अमरनाथ शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, सीबीए व बीबीए
कचहरी में आने वाले दिनों में चलने और बैठने तक के लिए जगह नहीं होगी। कचहरी के पास अगर जमीन मिल रही है, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। इंटीग्रेटेड कोर्ट आने वाले समय में युवा अधिवक्ताओं के लिए मील का पत्थर साबित होगा। सेंट्रल जेल की जमीन से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। - शैलेंद्र सिंह, वरिष्ठ अधिवक्ता