UP: रोटी के लिए पुश्तैनी चाैखट छोड़ रहा बुनकरी का हुनर, पांच साल में 10 हजार ने छोड़ा आशियाना; परेशानी
UP News: चंदौली के बुनकरों पर रोज़गार का संकट गहराता जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में करीब 10 हजार बुनकर परिवार बेहतर आजीविका की तलाश में अपना आशियाना छोड़कर सूरत, बेंगलुरु समेत अन्य शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। कभी 70 हजार लूमों की आवाज़ से गुलजार रहने वाली बस्तियों में अब सन्नाटा पसरा है। आर्थिक तंगी और घटते काम ने पुश्तैनी बनारसी बुनकरी को गहरे संकट में डाल दिया है।
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UP News: चंदौली का सबसे बड़ा बुनकर क्षेत्र दुलहीपुर, जिसे ताना-बाना नगरी के नाम से भी जाना जाता है, आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। कभी करघों की आवाज और बनारसी साड़ियों की चमक से गुलजार रहने वाला यह क्षेत्र अब धीरे-धीरे सन्नाटे की ओर बढ़ रहा है। यहां लगभग 50 हजार से अधिक परिवार आज भी साड़ी उद्योग और बुनकरी से जुड़े हुए हैं, लेकिन काम की कमी, घटती मजदूरी, बढ़ती लागत और आधुनिक मशीनों की प्रतिस्पर्धा ने इस पारंपरिक उद्योग की नींव को हिला दिया है।
बीते पांच वर्षों में करीब 10 हजार बुनकर रोजी-रोटी की तलाश में अपने घरों पर ताले लगाकर गुजरात के सूरत और कर्नाटक के बेंगलुरु जैसे महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। उनके घरों पर ताला लटका हुआ है। कभी 70 हजार लूम जिन बस्तियों में गूंजते थे अब वहां सन्नाटा पसरा है। इस कठिनाई होने के कारण हर साल बुनकरों की संख्या घटती जा रही है।
केस-1 भीसौड़ी गांव निवासी बुनकर कमरुद्दीन ने बताया कि पिछले 4 वर्षों से वह गुजरात में काम कर रहे हैं। यहां गुजरात में आधुनिक मशीनों का उपयोग होता है। जिससे महीने में 15 से 20 हजार रुपये कमा लेते हैं।
केस-2 दुलहीपुर निवासी बुनकर मुमताज ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से हम गुजरात में रह रहे हैं पूरे परिवार के साथ गुजरात में रह रहे हैं जब हम दुलहीपुर में थे तो गृहस्थ द्वारा 15 दिन का ही काम मिलता था अब 15 दिन बैठे रहते थे। यहां पर काम की कभी नहीं है यहां काम नहीं करने वालों को कारखाने वाले अपने कारखाने से निकाल देते हैं 24 घंटा यहां काम मिल रहा है।
केस-3 दुलहीपुर निवासी बुनकर नूरुद्दीन ने बताया कि अपने घरों में मशीन लगाकर 5 से 6000 ही कमा पाते थे। वही 2021 से पहले 95 रुपये महीने का बिजली का बिल देना पड़ता था। 2021 के बाद 430 प्रति मशीन हम लोगों को देना पड़ता है। कमाई कम थी खर्च अधिक था जिसके लिए हम लोगों ने पलायन कर बंगलौर चले आए। यहीं काम कर रहे हैं।
केस- 4
सतपोखरी गांव निवासी बुनकर अजीजुल हक ने बताया कि कोरोना काल के दौरान हम लोगों को बुनकरी का काम नहीं मिल पा रहा था। इस दौरान हम सूरत चले आए यहां आने पर सर्वाधिक काम भी मिलता है। 20-22 हजार रुपये महीने हम कमा लेते हैं जिससे परिवार का रोजी-रोटी चल जाता है।
केस- 5 भीसौड़ी गांव निवासी बुनकर अनवर ने बताया कि एक लूम पर औसतन एक दिन में केवल एक साड़ी की बुनाई हो पा रही थी। मजदूरी 100 से 300 रुपये तक मिल रहा था। उसी में परिवार का खर्चा वी राशन पानी के साथ ही बिजली बिल देना होता था। एक हफ्ता बाद काम मिलता था। जिससे 5 से 6 रुपये ही हम कमा पाए थे जिसके कारण 2021 में ही हम सूरत चले आए।
केस- 6 दुलहीपुर निवासी बनुकर गुलजार अहमद ने बताया कि अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी है जो बुनकर का काम कर रही है। गुजरात में पर्याप्त बिजली मिलता हैं। यहां आधुनिक मशीन हैं जिससे एक दिन में दो से ढाई साड़ियां हम निकाल देते हैं। यहां प्रतिदिन 700 से 1000 रुपये कमा लेते हैं। जब मैं दुलहीपुर था तो सौ रुपये से ढाई सौ रुपए ही कमा पता था।
दुलहीपुर क्षेत्र के इन गांवों में हैं बुनकर
दुल्हीपुर में भीसौड़ी, महाबलपुर, मलोखर, शकूराबाद, लेडुवापर, हरिशंकरपुर, सतपोखरी, सकुर के भट्ठा, प्लांट, डिबरीयापर, उसरापर, दुलहीपुर, करवत, मुहम्मदपुर, बगही व धोबिया के पूरा में बुनाई बड़े पैमाने पर होती है। यहां बनी साड़ियों की मांग मुंबई, कोलकाता, बंगलादेश, झारखंड और असम में है। लेकिन बीते पांच वर्षों में बाहर से ऑर्डर न मिलने के कारण सेठों ने साड़ियों की बुनाई कम कर दी है। पावरलूम पर साड़ियों पर काम करने वाले बुनकरों की संख्या दिन पर दिन कम हो गई है।
बुनकरों की सुनें
दुलहीपुर क्षेत्र में करीब 50 हजार परिवार बुनकर लघु उद्योग से जुड़े हैं। पांच वर्ष पहले करीब 60 से 70 हजार लूम चलते थे, जो अब लगभग आधे रह गए हैं। काम न मिलने से बुनकरों ने पलायन किया है। - हमिदुल्ला अंसारी, अध्यक्ष, संत कबीर बुनकर सोसाइटी, दुलहीपुर
बीते पांच साल में करीब 10 हजार बुनकरों ने यहां काम छोड़कर महानगरों की ओर रुख किया है। इस बीच कारोबार भी लगभग 40 फीसदी घट चुका है। - जलालुद्दीन, बुनकर, दुलहीपुर
जिले में बीते पांच साल से बुनकर व्यापार का ग्राफ लगातार नीचे जा रहा है। बुनकरों का तर्क है कि उचित मजदूरी न मिलने के कारण यहां से पलायन कर दूसरे राज्यों में चले गए हैं। वहां उनको मजदूरी भी अच्छी मिल रही है और काम भी 24 घंटा मिलता है जो व्यक्ति काम नहीं करता है उसे वहां से हटा दिया जाता हैं। - बेलाल अंसारी, बुनकर, दुलहीपुर
पूर्वांचल व वाराणसी चंदौली के अंदर जो बुनकरी का हुनर है वह कहीं नहीं है इसलिए बनारसी बुनकरों की का कोई जवाब नहीं है। बनारसी साड़ी से दुल्हन सजाई जाती है लेकिन आज बुनकरों को गद्दिदारों द्वारा महीने में 15 दिन बैठा देने से घर की आर्थिक स्थितियां सही नहीं हो पाती है। जिसके कारण बुनकर यहां से पलायन कर रहे हैं। - जमाल अख्तर, बुनकर, दुलहीपुर
दुलहीपुर की बुनकरी संकट में
- दुलहीपुर क्षेत्र से जुड़े बुनकर परिवार : 50 हजार से अधिक
- पांच वर्ष पहले संचालित लूम : 60 से 70 हजार
- वर्तमान में संचालित लूम : लगभग आधे
- पांच साल में पलायन करने वाले बुनकर : करीब 10 हजार
- कारोबार में गिरावट : लगभग 40 प्रतिशत
- स्थानीय स्तर पर मिलने वाला काम : महीने में लगभग 15 दिन
- स्थानीय मजदूरी : 100 से 300 रुपये प्रतिदिन
- गुजरात/बेंगलुरु में कमाई : 700 से 1000 रुपये प्रतिदिन
- गुजरात में औसत मासिक आय : 15 से 22 हजार रुपये
- बिजली शुल्क (पहले) : लगभग 95 रुपये प्रति मशीन
- बिजली शुल्क (वर्तमान) : लगभग 430 रुपये प्रति मशीन
- एक लूम पर औसत उत्पादन : एक दिन में एक साड़ी
- आधुनिक मशीनों से उत्पादन : एक दिन में दो से ढाई साड़ियां
क्यों छोड़ रहे हैं पुश्तैनी पेशा
- आधुनिक मशीनों से बढ़ी प्रतिस्पर्धा
- कम मजदूरी में काम करने की मजबूरी
- बढ़ती उत्पादन लागत
- बिजली खर्च में वृद्धि
- लगातार घटते ऑर्डर
- दूसरे राज्यों में क्यों जा रहे बुनकर
- 24 घंटे काम की उपलब्धता
- बेहतर मजदूरी
- आधुनिक मशीनों पर काम
- पर्याप्त बिजली आपूर्ति
- अधिक उत्पादन और ज्यादा आय
बोले अफसर
बुनकरों की समस्या की पूर्णतया जानकारी अभी तक नहीं मिली थी। अगर बुनकर काम छोड़ बाहर जा रहे हैं तो शासन द्वारा जो भी नियम व सुविधा है उनके बीच जाकर उपलब्ध कराई जाएगी। अब बुनकरों को वापस करने का भी कार्य किया जाएगा। - राजीव सक्सेना, एसडीएम, पीडीडीयू नगर
सरकार के द्वारा पावरलुम वह हैंडलूम बुनकरों दोनों को ही सब्सिडी का प्रावधान है। जो सभी बुनकरों को दिया जाता है। इसके अलावा बिजली की समस्या को देखते हुए 58 बुनकरों को सोलर लाइट भी वितरित की गई है। उनको समस्या न हो इसका पूरा ध्यान रखा जाता है। - नीतेश गौड़, टेक्सटाइल इंस्पेक्टर