कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र के हरिनगर गांव में हुई मारपीट की घटना अब जातीय टकराव का रूप ले चुकी है। मामला पहले दो लोगों के बीच का था, लेकिन पुलिस की लापरवाही के बाद यह पूरे गांव में फैल गया और अब ब्राह्मण बनाम पिछड़ा वर्ग का रूप ले चुका है।
पहली एफआईआर लेकिन पुलिस ने नहीं की कार्रवाई
हेमकांत झा ने 30 जनवरी को आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि उन पर धारदार हथियार से हमला किया गया और लूटपाट भी हुई। लेकिन आरोप है कि कुशेश्वरस्थान थाना की पुलिस ने इस मामले में समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की।
तीसरे दिन पीड़ितों ने खुद उठाया कदम
पुलिस की कार्रवाई न होने से नाराज पीड़ित पक्ष ने तीसरे दिन यानी 1 फरवरी को खुद कानून हाथ में ले लिया और हमला कर दिया। इस घटना में 11 दलित परिवार के लोग घायल हो गए। इसके बाद मामला पूरी तरह से जातीय तनाव में बदल गया। अब यह सिर्फ दो लोगों की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि इसे ब्राह्मण बनाम पिछड़ा वर्ग का रूप दे दिया गया है।
दूसरी एफआईआर में 70 नामजद, 100 से ज्यादा अज्ञात आरोपी
विक्रम पासवान की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में कुल 70 लोगों को नामजद किया गया है और करीब 100 से 150 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। इस एफआईआर में कई ऐसे लोगों के नाम भी हैं जो काफी समय से गांव में नहीं हैं। कुछ लोग दिल्ली और दूसरे राज्यों में नौकरी कर रहे हैं या पढ़ाई कर रहे हैं। बिरौल के SDPO प्रभाकर तिवारी ने भी माना है कि यह मामला शुरू में सिर्फ दो लोगों के बीच पैसों के लेन-देन का विवाद था लेकिन अब इसे जातीय रंग दे दिया गया है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ ज्यादती हुई है। पुलिस अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है और बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी की कोशिश जारी है। इस पूरे मामले में कुशेश्वरस्थान थानाध्यक्ष को दोषी मानते हुए SSP जगुनाथ रेड्डी ने उन्हें निलंबित कर दिया है।
'बेटे को जेल भेज दिया'
ब्राह्मण समाज की जानकी देवी ने बताया कि उनके बेटे को भी आरोपी बना दिया गया है और पुलिस उसे गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है। उन्होंने कहा कि अगर पैसों का विवाद था तो इसे समाज के स्तर पर बैठकर सुलझाया जा सकता था। लेकिन पासवान समाज के लोगों ने गांव के बेटी-दामाद के साथ मारपीट की। जब इज्जत पर बात आई, तब विवाद और बढ़ गया। उन्होंने बताया कि गांव में अभी भी बहुत तनाव है। दवा तक नहीं मिल पा रही है। उनके घर में पांच दिनों से चूल्हा नहीं जला है। लोग डर के साये में जी रहे हैं। घटना के बाद पुरुष डर के मारे फरार बताए जा रहे हैं और घरों में सिर्फ महिलाएं ही मौजूद हैं।
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'मामला पैसों का था'
दूसरे पक्ष के वीरेंद्र पासवान का कहना है कि असली विवाद सिर्फ पैसों के लेन-देन का था, लेकिन बाद में इसे जातीय रंग दे दिया गया। उनका आरोप है कि एफआईआर में ऐसे लोगों को भी आरोपी बना दिया गया है जो गांव में रहते ही नहीं हैं या बाहर रहते हैं। SC-ST के लिए काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने भी माना है कि एफआईआर में कुछ निर्दोष लोगों के नाम जोड़ दिए गए हैं और कुछ असली दोषियों के नाम छूट गए हैं। उनकी मांग है कि जो दोषी हैं उनके नाम जोड़े जाएं और जो निर्दोष हैं उनके नाम हटाए जाएं।
गांव का माहौल अब भी खराब
गांव में अभी भी हालात ठीक नहीं हैं। ब्राह्मण समाज के पुरुष गिरफ्तारी के डर से फरार बताए जा रहे हैं। वहीं घायल लोग घटना को याद कर अब भी कांप जाते हैं। पूरे गांव में डर और तनाव का माहौल बना हुआ है।
शांति बहाल करने की कोशिश जारी
SDPO प्रभाकर तिवारी ने कहा कि यह मामला दो लोगों के बीच पैसों के लेन-देन से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह जातीय तनाव में बदल गया है। उन्होंने फिर दोहराया कि अनुसूचित जाति के लोगों के साथ ज्यादती हुई है। उन्होंने बताया कि अब तक 12 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और बाकी आरोपियों को पकड़ने की कोशिश जारी है। साथ ही गांव में शांति बनाए रखने के लिए पुलिस लगातार प्रयास कर रही है।