बिलासपुर हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की वरिष्ठता को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी का प्रारंभिक पदोन्नति आदेश अनियमितताओं के कारण रद्द हो जाता है, तो वह बाद में नए सिरे से मिली पदोन्नति के बाद पुराने निरस्त आदेश की तारीख से वरिष्ठता का लाभ नहीं मांग सकता।
यह फैसला सूरजपुर जिले के पांच मिडिल स्कूल प्रधानपाठकों की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज करने के बाद आया है। यह आदेश न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने जारी किया है। हाईकोर्ट का यह निर्णय सरकारी सेवा में पदोन्नति और वरिष्ठता से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा। यह उन कर्मचारियों के लिए स्पष्टता प्रदान करता है जिनकी पदोन्नति में पहले अनियमितताएं पाई गई थीं। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनियमितताओं के कारण रद्द किया गया आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जा सकता। इसलिए, उस रद्द आदेश के आधार पर किसी भी प्रकार के लाभ की मांग करना अनुचित है। यह निर्णय सरकारी विभागों में पारदर्शिता और नियमों के पालन को बढ़ावा देगा।
याचिकाकर्ता शोभनाथ चौबे, अशोक कुमार उपाध्याय, दिनेश कुमार द्विवेदी, संजय कुमार त्रिपाठी और दिनेश कुमार कौशिक हैं। ये सभी सूरजपुर जिले की विभिन्न शासकीय पूर्व माध्यमिक शालाओं में प्रधानपाठक के पद पर कार्यरत थे। इन शिक्षकों को पहली बार 7 सितंबर 2012 को प्रधानपाठक पद पर पदोन्नति दी गई थी। हालांकि, इन प्रधानपाठकों के खिलाफ अनियमितता के गंभीर आरोप लगे थे। इन आरोपों की जांच के बाद उनके प्रारंभिक पदोन्नति आदेश को रद्द कर दिया गया था। यह विभागीय कार्रवाई नियमों के तहत की गई थी।
विभागीय आदेश को चुनौती
प्रारंभिक पदोन्नति आदेश रद्द होने के बाद, सभी प्रधानपाठकों ने इस विभागीय आदेश को चुनौती दी। उन्होंने इसे निरस्त करने के लिए बिलासपुर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें पुराने निरस्त आदेश की तारीख से वरिष्ठता का लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने अपनी पदोन्नति को बहाल करने और पुरानी वरिष्ठता बनाए रखने की मांग की थी। यह मामला सरकारी सेवा नियमों की व्याख्या और उनके क्रियान्वयन से जुड़ा था। उन्होंने अपनी याचिका में कई कानूनी बिंदुओं पर जोर दिया था।
जानें सुनवाई के दौरान कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सभी प्रस्तुत तथ्यों और तर्कों पर गहन विचार किया। न्यायालय ने पाया कि प्रारंभिक पदोन्नति आदेश अनियमितताओं के कारण ही रद्द किए गए थे। न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने की गई विभागीय कार्रवाई को पूरी तरह उचित माना। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि अनियमितताओं के कारण रद्द हुए आदेश से वरिष्ठता का कोई लाभ नहीं मिल सकता। इस महत्वपूर्ण आधार पर, उच्च न्यायालय ने सभी पांच शिक्षकों की याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करेगा और नियमों के पालन पर जोर देगा।