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गुरुग्राम: अरावली की पहाड़ियों में छिपे मानव सभ्यता के अवशेष, संरक्षण की मांग
गुरुग्राम। 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। अरावली की पहाड़ियों में मानव सभ्यता की शुरुआत के अवशेष छिपे हैं। इस मौके पर अरावली पर शोध करने वालों ने अरावली में पुरातात्विक अवशेषों को सुरक्षित रखने की मांग की है। हालांकि पुरातत्व विभाग इस पर शोध कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनंगपुर से लेकर राजस्थान तक गुफाओं में मिले भित्ती चित्र, पत्थरों औजार, कप मार्क्स के अध्ययन के लिए अरावली की पहाड़ियों पर इन जगहों पर खनन और कॉलोनाइजेशन को रोकने के साथ उन पर गहन अध्ययन होना चाहिए।
हरियाणा सरकार के वन संरक्षक रहे अरावली पर अध्ययन करने और अरावली के जंगल सभ्यताओं के रहस्य पर किताबें लिखने वाले डॉ.आरपी बलवान ने कहा कि
अरावली में आर्कियोलॉजिकल विभाग के अध्ययन में अनंगपुर से लेकर मांगर, पाली, कोट, धौज और सोहना तक प्राग ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं। वेद, महाभारत आदि साहित्य ही नहीं पुरातत्व का वैज्ञानिक अध्ययन मनुष्यों के विकास की कहानी कहता है। विश्व के प्राचीनतम विकास के अवशेष यहां हैं। अरावली क्षेत्र में आईस एज में गुफाओं में मनुष्यों के निवास के चिन्ह गुफाओं में मिले चित्रों, औजारों में दिखते हैं। हरियाणा से लेकर राजस्थान तक ऐसे अवशेष हैं। अरावली के 5000 से 10,000 एकड़ इलाके को सहेजने की जरूरत हैं। ताकि मानव सभ्यता के विकास का अध्ययन किया जा सके।
वरिष्ठ आर्कियोलॉजिस्ट और पुरातत्व विभाग के पूर्व उपनिदेशक डॉ बनानी भट्टाचार्य कहती हैं कि फतेहाबाद के विराना, राखीगढ़ी आदि के अलावा मांगर, कोट, धौज में अरावली में स्टोन टूल्स, भित्ति चित्र मिले हैं जो मानव सभ्यता की शुरुआत के साक्ष्य हैं जिन पर सर्वे काम चल रहा है। यह ऐसे साक्ष्य है जिनका अध्ययन मनुष्यों के विकास की कहानी जानने के लिए जरूरी है। पुराने अवशेषों वाले क्षेत्र को विशेष जोन बनाकर संरक्षित किए जाने की जरूरत है। मध्यकालीन भवनों को उनके मूल रूप में पुनरोद्धार की जरूरत है। जैसे यूरोपीय देशों में किया जाता है।
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