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Two-day national seminar on 'The Contribution of Maharshi Vedavyas to the Indian Knowledge Tradition' inaugurated at Nehru Mahavidyalaya.
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नेहरू महाविद्यालय में 'भारतीय ज्ञान परंपरा में महर्षि वेदव्यास के योगदान' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
नीरज नरवरिया
Updated Thu, 06 Aug 2026 09:21 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो, ललितपुर।
महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के कुलपति प्रो. शिवशंकर मिश्र ने कहा कि वेद ज्ञान की अक्षय निधि हैं और वर्तमान समय में संस्कृत का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि "संस्कृत ही भारत है और भारत ही संस्कृत है।" उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान परंपरा का मूल आधार संस्कृत भाषा है।
वह बृहस्पतिवार को नेहरू महाविद्यालय में संस्कृत, संस्कृति संस्थानम्, अखिल भारतीय साहित्य परिषद (उप्र) तथा संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। संगोष्ठी का विषय 'भारतीय ज्ञान परंपरा में महर्षि वेदव्यास का योगदान' रखा गया है।
प्रो. शिवशंकर मिश्र ने कहा कि धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, नीति, राजनीति और मानवीय संबंधों का मूल स्रोत महाभारत है। उन्होंने कहा कि वेदों के संकलन, संपादन और वर्गीकरण का श्रेय महर्षि वेदव्यास को जाता है। उपनिषद, पुराण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों के रचनाकार के रूप में उनका योगदान भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर है।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ओमप्रकाश शास्त्री ने कहा कि यदि महर्षि वेदव्यास के योगदान को भारतीय परंपरा से अलग कर दिया जाए तो हमारा संपूर्ण ज्ञानकोश रिक्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी की संस्कृत शोध पीठ के निदेशक प्रो. बलबहादुर त्रिपाठी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास जयंती के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। उन्होंने कहा कि यदि समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाना है तो शास्त्रों की शरण में जाना होगा। उन्होंने महर्षि वेदव्यास का उद्धरण देते हुए कहा, "दूसरों का हित करने के समान कोई धर्म नहीं और दूसरों का अहित करने के समान कोई पाप नहीं।"
डाॅ. हरी सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के डॉ. शशि कुमार सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य को यह सिखाती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उन्होंने कहा कि ज्ञान के प्रकाश में निरंतर रत रहने वाला ही वास्तविक अर्थों में भारतीय है।
सह-आचार्य डॉ. रेड्डी ने कहा कि मनुष्य के विचार, व्यवहार, भाषा और अभिव्यक्ति का आधार भारतीय ज्ञान परंपरा ही है। वहीं महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय, कटनी की सहायक आचार्या डॉ. नेहा मिश्रा ने संस्कृत साहित्य में गुरु महिमा के महत्व पर प्रकाश डाला।
महाविद्यालय के प्रबंधक प्रदीप चौबे ने कहा कि भारतीय ऋषि परंपरा देश की ज्ञान-संपदा की संरक्षक रही है। उन्होंने कहा कि नेहरू महाविद्यालय को समय-समय पर विद्वानों और शिक्षाविदों का मार्गदर्शन मिलता रहा है, जिससे विद्यार्थियों में ज्ञान, संस्कार और नैतिक मूल्यों का विकास हुआ है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. दीपक पाठक ने किया, जबकि आभार प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष विलास पटैरिया ने व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. प्रीति सिरौटिया, प्रो. आशा साहू, प्रो. अनिल सूर्यवंशी, हिमांश धर द्विवेदी, जितेंद्र कुमार, डॉ. सुधाकर उपाध्याय, डॉ. ओ.पी. चौधरी, डॉ. संजीव कुमार सहित बड़ी संख्या में शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
रामराजीय शतकम्' पुस्तक का हुआ विमोचन
संगोष्ठी के दौरान महाकवि एवं शिक्षाविद् प्रो. बलबहादुर त्रिपाठी द्वारा रचित 'रामराजीय शतकम्' पुस्तक का विमोचन किया गया। द्वितीय सत्र में देशभर से आए शिक्षाविदों एवं प्राध्यापकों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रबंधक प्रदीप चौबे, उपाध्यक्ष विलास पटैरिया एवं प्राचार्य प्रो. ओमप्रकाश शास्त्री ने अतिथियों का शाल और स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मान किया।
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