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गांधीजी से प्रेरित होकर स्कूल छोड़ा, आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे बृजनंदन
नीरज नरवरिया
Updated Sat, 08 Aug 2026 10:17 PM IST
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ललितपुर। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर महज 14 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजनंदन शर्मा ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लंबा संघर्ष किया। वर्ष 1930 में पहली बार जेल जाने के बाद भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें फिर गिरफ्तार कर एक वर्ष की सजा और 100 रुपये का जुर्माना सुनाया गया। अंग्रेजी हुकूमत के इस फैसले को भी उन्होंने हंसते हुए स्वीकार किया।
शहर के सुभाषपुरा मोहल्ले में कॉमर्शियल इंस्पेक्टर नारायणदास तिवारी के घर जन्मे बृजनंदन शर्मा का बचपन से ही राजनीति और देश की आजादी के प्रति रुझान था। 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने विद्यालय में अपने सहपाठियों का संगठन बनाया और उसका नेतृत्व किया। इसी दौरान महात्मा गांधी ने विद्यार्थियों से स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का आह्वान किया। गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर बृजनंदन ने पढ़ाई छोड़ दी और वर्ष 1929 में कांग्रेस के स्वयंसेवक बन गए।
इसके बाद वह स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। उनकी सक्रियता से तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी डीवाईएसपी ब्रूम नाराज था। बताया जाता है कि एक बार वह उन्हें रामनगर मोहल्ले से बाल पकड़कर घसीटते हुए ले गया और बेरहमी से पिटाई की। गिरफ्तार किए जाने के दौरान अंग्रेज अफसर अक्सर उनसे पूछता था- ‘रखनी जालिम सरकार या नहीं रखनी।’ इस पर बृजनंदन का जवाब होता था- ‘नहीं रखनी जालिम सरकार।’
कई जेलों में झेली यातनाएं
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता के कारण बृजनंदन शर्मा को कई बार गिरफ्तार किया गया। उन्होंने ललितपुर, झांसी, लखनऊ कैंप जेल, इलाहाबाद और आगरा की जेलों में यातनाएं झेलीं। जेल में उनकी मुलाकात स्वतंत्रता आंदोलन के कई प्रमुख नेताओं से हुई। इनमें लाल बहादुर शास्त्री, बाबू संपूर्णानंद, सुंदरलाल कर्मवीर, कृष्णदत्त पालीवाल, सेठ अचल सिंह और रामचंद पालीवाल शामिल थे।
वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का जिले में बिगुल बजा तो बृजनंदन शर्मा भी आंदोलन में सक्रिय हो गए। अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर एक वर्ष की सजा और 100 रुपये का जुर्माना लगाया। आजादी के लिए समर्पित बृजनंदन ने इस सजा को भी मुस्कुराते हुए स्वीकार किया।
1930 से 1942 तक कई बार हुई गिरफ्तारी
बृजनंदन शर्मा के पुत्र संतोष शर्मा बताते हैं कि उनके पिता को वर्ष 1930 में पहली बार तीन माह की सजा हुई थी। इसके बाद वर्ष 1931 में छह माह, वर्ष 1932 में चार माह की सजा और 50 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इसी वर्ष उन्हें दोबारा छह माह की सजा भुगतनी पड़ी। वर्ष 1941 में छह माह की सजा के साथ 100 रुपये का जुर्माना लगाया गया। वर्ष 1942 में उन्हें एक वर्ष की सजा और 100 रुपये का जुर्माना सुनाया गया। इस तरह वर्ष 1930 से 1942 तक वह कई बार गिरफ्तार होकर जेल गए।
आजादी के बाद भी निभाई सार्वजनिक जिम्मेदारी
देश को आजादी मिलने के बाद भी बृजनंदन शर्मा सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। वर्ष 1953 से 1958 तक उन्होंने नगर पालिका अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी संभाली। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के जिलाध्यक्ष और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंत्री परिषद के मंत्री भी रहे। इसके अलावा करीब नौ वर्ष तक जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी निभाई।
बृजनंदन शर्मा का जीवन इस बात की मिसाल रहा कि कम उम्र में मन में जगी देशभक्ति की भावना ने उन्हें अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष की राह पर ला खड़ा किया और जेल की यातनाएं भी उनके इरादे को डिगा नहीं सकीं।
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