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Khandwa: मूकबधिर बालिका ने इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट से फैशन डिजाइनिंग का डिप्लोमा, अब अपने जैसों को सिखाएंगी काम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, खंडवा Published by: खंडवा ब्यूरो Updated Thu, 30 Jan 2025 08:41 AM IST
खंडवा नगर की एक मूकबधिर युवती ने अपनी दिव्यांगता के बावजूद कुछ ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसे करने में एक सामान्य मनुष्य को भी कड़ी मशक्कत करनी होती है। यहां की एक युवती आयशा ने अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बना कर अपना बचपन का सपना पूरा करने फैशन डिजाइनिंग जैसे चैलेंजिंग कैरियर को चुना और अब उसने फैशन डिजाइनिंग में महारत हासिल करने के साथ ही, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट से डिग्री भी हासिल करते हुए अपना और अपने परिवार सहित खंडवा का भी नाम रोशन किया है। वहीं आयशा अब अपनी ही तरह के लोगों को जोड़ कर उन्हें भी फैशन डिजाइनिंग के प्रोफेशन में लाना चाहती हैं। वहीं आयशा की इस कामयाबी में उसके शिक्षक और परिवार वालो ने भी उन्हें पूरा सहयोग किया, जिसके चलते ही आज आयशा अपने सपने को पूरा कर पाई हैं।
खंडवा के गणेश तलाई की रहने वाली आयशा जन्म से ही सुन और बोल नहीं सकती हैं। हालांकि वे इशारों से बात कर लेती हैं । वहीं आयशा ने कक्षा 10 तक की पढ़ाई भी की हुई है, लेकिन सुनने और बोलने में दिक्कतों के चलते उन्हें अपनी पढाई बीच में ही छोड़नी पड़ गई। इधर आयशा के पिता शेख आजाद खंडवा में ही एक दूध की डेयरी चलाते हैं। आयशा के पिता ने आयशा के इलाज के लिए भी भरपूर कोशिशें की।
उन्होंने आयशा का ऑपरेशन करवा कर उसको कान की मशीन भी लगवाई, ताकि उससे आयशा सुन सकें। लेकिन उनकी इस कोशिश से भी उसे फायदा नहीं हुआ। ऐसे में एक दिन आयशा ने अपने माता पिता को इशारे में बताया की वह फैशन डिजायनर बनना चाहती है, लेकिन खंडवा में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स और वो भी इस तरह की हालत में सीख पाना तो किसी कठिन चेलेंज से कम नहीं था। ऐसे में खंडवा के अलमा इंस्टीट्यूट ने इस चेलेंज को एक्सेप्ट कर लिया। बता दें कि अलमा एक इटरनेशनल फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट है, जहां आयशा ने सामान्य लड़कियों के साथ ही बैठ कर फैशन डिजाइनिंग सीखी।
शिक्षिका ने पहले खुद ही सीखी साइन लैंग्वेज
आयशा को सिखाने वाली उनकी शिक्षिका और ट्रेनर रुबीना खान बताती हैं कि, उनके लिए ये एक बड़ा चेलेंज था। क्योंकि आयशा सुन और बोल नहीं पाती हैं। इसलिए पहले उन्हें खुद ही साइन लेंग्वेज सीखना पड़ी, जिसके बाद उन्होंने आयशा को सिखाना शुरू किया। अब आयशा डिजाइन के नए नए स्केच बना लेती हैं और न सिर्फ डिजाइन के स्केच बनाती हैं, बल्कि अपने बनाए डिजाइन को सिलकर उन्हें तैयार कर डिस्प्ले भी करती हैं। वहीं आयशा ने सामान्य छात्रों की तरह ही नियत समय में अपने कोर्स को पूरा कर डिग्री भी हासिल की है।
पिता ने सिखवाई साइन लैंग्वेज
इधर, आयशा के पिता शेख आजाद ने बताया कि उनकी बेटी आयशा बोल भी नहीं सकती और सुन भी नहीं सकती। ऐसे में हमने देखा की उसका जेहन यानी मन फैशन डिजाइनिंग की तरफ ज्यादा है। इसलिए हमने आयशा को इस कोर्स में दाखिला दिलवाया। उन्होंने आयशा को हर वो सुविधा देने की कोशिश की जो उसे चाहिए होती। अब वे चाहते हैं कि आयशा की तरह ही जो भी बच्चे हैं, उन्हें उनके माता पिता आगे लाएं, और उन्हें आगे बढ़ने में पूरी मदद करें।
वहीं शेख आजाद बताते हैं कि बोल और सुन नहीं पाने के कारण उन्हें आयशा को समझने में भी बहुत दिक्कत होती है। उन्होंने आयशा का इलाज भी करवाया, जिसमें आयशा के मस्तिष्क में एक मशीन भी लगी है। जिससे उसे ज्यादा फायदा तो नहीं हुआ है, लेकिन उसे उससे कुछ चीजें समझ मे आने लगी हैं। उन्होंने आयशा को साइन लेंग्वेज भी सिखाई और घर में भी उससे इसी तर्ज पर बात करते रहते है। आयशा को डिप्लोमा मिलने के बाद अब वो खुश हैं और चाहते हैं कि आयशा एक अच्छी फैशन डिजायनर बने, और अपने तरह के लोगों को भी फैशन डिजाइनिंग सिखाए।
मां का है अहम किरदार
आयशा को इस मुकाम तक लाने में उसकी मां शमीम शेख का भी अहम किरदार है। आयशा की मां शमीम ने बचपन से ही आयशा की तरबियत की। उन्होंने उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए हर वो काम किया जो जरूरी था। हालांकि बोल ओर सुन नहीं पाने के चलते उन्हें काफी दिक्कतें भी होती हैं, लेकिन बार बार समझाने से आयशा उसे समझ कर पूरा कर लेती है। हालांकि सिलाई बुनाई से कभी उनका नाता नहीं रहा, लेकिन अपनी बेटी के कारण उन्हें भी बहुत कुछ सीखने को मिला है ।
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