धर्मधानी उज्जैन में इन दिनों परिवहन विभाग और बस संचालकों के बीच टकराव की स्थिति चरम पर पहुंच गई है। उज्जैन आरटीओ द्वारा करीब 800 लग्जरी और टूरिस्ट बसों के रजिस्ट्रेशन कंप्यूटर सिस्टम से ब्लॉक किए जाने के बाद जिले में परिवहन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। पिछले एक महीने से अधिक समय से इन बसों के पहिए थमे हुए हैं, जिसके विरोध में अब बस ऑपरेटरों ने सामूहिक हड़ताल का रास्ता अख्तियार कर लिया है। संचालकों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रदेश सरकार ने जल्द ही उनकी सुध नहीं ली, तो वे प्रदेशव्यापी चक्काजाम करने को मजबूर होंगे।
दरअसल, यह पूरा विवाद स्लीपर बसों में सुरक्षा मानकों को लेकर शुरू हुआ है। हाल ही में राजस्थान सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्लीपर बसों में हुई आगजनी की घटनाओं के बाद मानवाधिकार आयोग और परिवहन मंत्रालय ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के तहत बसों में पांच दरवाजों की अनिवार्यता और आपातकालीन निकास के पुख्ता इंतजाम करने को कहा गया है। आरटीओ प्रशासन का स्पष्ट रुख है कि जिन गाड़ियों के दस्तावेज पूर्ण नहीं हैं या जो तय मानकों (Norms) को पूरा नहीं करतीं, उनका फिटनेस और परमिट तब तक बहाल नहीं किया जाएगा जब तक वे भौतिक रूप से सत्यापन नहीं करा लेतीं।
बस ऑपरेटर बोले समय कम दिया गया
दूसरी ओर, बस ऑपरेटरों का तर्क है कि वे नियमों का पालन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन विभाग द्वारा दिया गया समय बेहद कम है। बस एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि एक बस की बॉडी में तकनीकी बदलाव करने और 36 स्लीपर की व्यवस्था को संशोधित करने में समय और संसाधन लगते हैं। रातों-रात पूरे भारत में इस तरह का बदलाव संभव नहीं है। ऑपरेटरों ने मांग की है कि उन्हें इन संशोधनों को पूरा करने के लिए कम से कम 6 महीने का समय दिया जाए।
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संचालकों ने बस बनावाट का दिया तर्क
संचालकों ने यह भी स्पष्ट किया कि टूरिस्ट बसों की बनावट रूट पर चलने वाली सामान्य बसों से अलग होती है। इनमें स्लाइडिंग ग्लास होते हैं जिनसे आपात स्थिति में यात्री आसानी से बाहर निकल सकते हैं। सबसे बड़ी चिंता उन यात्रियों और श्रद्धालुओं को लेकर है जो वर्तमान में इन बसों के माध्यम से नर्मदा परिक्रमा और ज्योतिर्लिंग यात्रा पर निकले हुए हैं। परमिट निरस्त होने के कारण हजारों हिंदू धर्मावलंबी बीच रास्ते में फंसने की स्थिति में हैं।
उज्जैन के पर्यटन और परिवहन उद्योग में हलचल
वर्तमान में करोड़ों रुपयों का निवेश कर खरीदी गई ये बसें धूल फांक रही हैं, जिससे ऑपरेटरों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। अब गेंद सरकार के पाले में है। क्या प्रशासन सुरक्षा मानकों पर समझौता करेगा या बस ऑपरेटरों की मांग को मानते हुए उन्हें अतिरिक्त समय प्रदान करेगा। फिलहाल, इस खींचतान ने उज्जैन के पर्यटन और परिवहन उद्योग में भारी हलचल पैदा कर दी है।