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यूरोप की झुलसती गर्मी: क्या भारत समय रहते सबक लेगा?
सार
यूरोप का अधिकांश इंफ्रास्ट्रक्चर उस समय बनाया गया था, जब वहां इतनी भीषण गर्मी की कल्पना भी नहीं की जाती थी। आज वही व्यवस्था कई स्थानों पर गर्मी को भीतर रोक रही है। अधिकांश घरों में एयर कंडीशनर नहीं हैं, क्योंकि दशकों तक उनकी जरूरत नहीं पड़ी।
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यूरोप में अल नीनो नहीं बल्कि इस वजह से पड़ रही भीषण गर्मी
- फोटो : Amarujala.com/AI
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विस्तार
यूरोप को लंबे समय से आधुनिक जीवन, बेहतरीन बुनियादी ढांचे और सुव्यवस्थित शहरों का प्रतीक माना जाता रहा है। वहां की साफ-सुथरी सड़कें, समय पर चलने वाली रेल सेवाएं, उत्कृष्ट स्वास्थ्य व्यवस्था और नागरिक सुविधाएं, दुनिया के लिए एक आदर्श मानी जाती हैं, लेकिन इस वर्ष भीषण गर्मी ने यूरोप की उसी व्यवस्था की ऐसी परीक्षा ली कि पूरा महाद्वीप असहज दिखाई देने लगा है।
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स्पेन, फ्रांस, इटली, ग्रीस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड जैसे देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। कई स्थानों पर रेल सेवाओं की गति कम करनी पड़ी, कुछ जगहों पर रेल पटरियां गर्मी के कारण प्रभावित हुईं। जंगलों में आग फैल गई। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ गए। प्रशासन को लोगों से घरों में रहने की अपील करनी पड़ी।
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यूरोप के कई शहरों में पहली बार यह एहसास हुआ कि जलवायु परिवर्तन कोई भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता है। यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है, जिस यूरोप ने दुनिया को आधुनिक इंजीनियरिंग, शहरी नियोजन और तकनीक का रास्ता दिखाया, वही आज गर्मी के सामने इतना असहाय क्यों दिखाई दे रहा है?
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भारत में तो रहता है 45 से 48 डिग्री तापमान
पहली नजर में भारत का कोई भी नागरिक यह सोच सकता है कि हमारे यहां तो हर वर्ष राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, विदर्भ जैसे क्षेत्रों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। खेतों में किसान काम करते हैं। मजदूर निर्माण कार्य करते हैं। जीवन किसी न किसी तरह चलता रहता है। फिर यूरोप में ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा?
क्या इसका अर्थ यह है कि भारत का बुनियादी ढांचा यूरोप से बेहतर है? उत्तर- बिल्कुल नहीं। यूरोप आज भी सड़कों, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं, जल प्रबंधन और शहरी नियोजन के मामले में भारत से कहीं आगे है। अंतर व्यवस्था का नहीं, बल्कि जलवायु के अनुरूप उसकी तैयारी का है।
यूरोप का अधिकांश इंफ्रास्ट्रक्चर उस समय बनाया गया था, जब वहां इतनी भीषण गर्मी की कल्पना भी नहीं की जाती थी। घरों को ठंड से बचाने के लिए बनाया गया। छोटी खिड़कियां, मोटी दीवारें और बेहतर इंसुलेशन इस उद्देश्य से तैयार किए गए कि गर्मी बाहर न निकले। आज वही व्यवस्था कई स्थानों पर गर्मी को भीतर रोक रही है।
अधिकांश घरों में एयर कंडीशनर नहीं हैं, क्योंकि दशकों तक उनकी जरूरत नहीं पड़ी। इसके विपरीत भारत की जीवनशैली सदियों से गर्म मौसम के साथ विकसित हुई है। राजस्थान की हवेलियां, गुजरात के आंगन वाले मकान, दक्षिण भारत की ऊंची छतें, मिट्टी के घड़े, सूती कपड़े, पेड़ों की छाया और प्राकृतिक हवा के अनुरूप बने घर किसी फैशन का हिस्सा नहीं थे, बल्कि जलवायु के अनुरूप विकसित वैज्ञानिक समाधान थे।
क्या इसका मतलब यह है कि भारत सुरक्षित है? यहीं सबसे बड़ी भूल होने की आशंका है।
भारत भी तेजी से वही गलती दोहरा रहा है, जो कभी यूरोप ने की थी। आज हमारे शहरों में कांच की ऊंची इमारतें तेजी से बन रही हैं। हरियाली घट रही है। तालाब और जलाशय समाप्त हो रहे हैं। कंक्रीट के जंगल दिनभर गर्मी सोखते हैं। रातभर उसे छोड़ते रहते हैं। परिणाम यह है कि शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से कई डिग्री अधिक हो जाता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में अर्बन हीट आइलैंड कहा जाता है।
क्या हमने कभी सोचा है कि जिन कांच की इमारतों को हम आधुनिकता का प्रतीक मानते हैं, वे भारतीय गर्मी के लिए वास्तव में कितनी उपयुक्त हैं? क्या हर नया शहर दुबई, लंदन या न्यूयॉर्क की नकल करके बनाया जा सकता है? क्या हमने अपने पारंपरिक भवन निर्माण की वैज्ञानिक समझ को बहुत जल्दी भुला दिया? ये प्रश्न केवल वास्तुकला के नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था और नागरिक सुरक्षा के भी हैं।
जलवायु संकट का बड़ा खतरा
यूरोप की वर्तमान स्थिति यह भी बताती है कि केवल आर्थिक समृद्धि किसी देश को जलवायु संकट से नहीं बचा सकती। आज यूरोप के पास संसाधन हैं। तकनीक है। मजबूत प्रशासन है। इसलिए वह आने वाले वर्षों में अपने शहरों, भवनों और परिवहन व्यवस्था को बदल भी लेगा, लेकिन भारत के सामने चुनौती कहीं बड़ी है, क्योंकि यहां करोड़ों लोग सीमित संसाधनों के साथ रहते हैं।
यह भी सच है कि भारत में हर वर्ष भीषण गर्मी के कारण हजारों लोग प्रभावित होते हैं। मजदूरों की कार्यक्षमता घटती है। बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती है। जल संकट गहराता है। गरीब परिवार सबसे अधिक परेशानी झेलते हैं। इसलिए यह कहना कि भारत को गर्मी से कोई फर्क नहीं पड़ता, वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा।
फिर एक प्रश्न बार-बार पूछा जाता है। यदि यूरोप में इतनी समस्याएं हैं तो लोग वहां बसना क्यों चाहते हैं? उत्तर सीधा है। लोग केवल मौसम देखने नहीं जाते, बल्कि जीवन की गुणवत्ता देखने जाते हैं। स्वच्छ हवा, बेहतर शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, कानून का प्रभावी शासन, पारदर्शी प्रशासन और सम्मानजनक कार्य-जीवन संतुलन आज भी यूरोप की सबसे बड़ी ताकत हैं।
किसी देश की श्रेष्ठता केवल उसके मौसम से तय नहीं होती, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। भारत के पास आज वह अवसर है, जो शायद यूरोप के पास नहीं था। हम दूसरों के अनुभवों से सीख सकते हैं। हमें ऐसी सड़कें, पुल, रेलवे, अस्पताल और शहर बनाने होंगे, जो केवल आज की नहीं, बल्कि अगले पचास वर्षों की जलवायु को ध्यान में रखकर तैयार किए जाएं।
हर शहर के लिए प्रभावी हीट एक्शन प्लान होना चाहिए। शहरी विकास में पेड़ों और जलाशयों को कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए। पारंपरिक भारतीय वास्तुकला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का विषय बनाया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह सड़क, रेल, ऊर्जा, आवास, स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधन और वित्त, सभी मंत्रालयों की साझा जिम्मेदारी है। यूरोप की झुलसती गर्मी भारत के लिए किसी दूसरे देश की परेशानी नहीं है। यह भविष्य का आईना है।
आज सवाल यह नहीं है कि भारत 45 या 48 डिग्री तापमान सह सकता है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हमारा 2047 का विकसित भारत 50 डिग्री तापमान में भी सुरक्षित, उत्पादक और रहने योग्य रहेगा?
क्या हम आज ऐसे शहर बना रहे हैं, जिनमें हमारे बच्चे आने वाले 50 वर्षों तक सुरक्षित रह सकें? क्या हमारी विकास योजनाओं में जलवायु परिवर्तन को उतनी ही गंभीरता से लिया जा रहा है, जितनी जीडीपी और आर्थिक विकास को? इन प्रश्नों के उत्तर ही भारत के भविष्य की दिशा तय करेंगे।
इतिहास हमें बार-बार सिखाता है कि बुद्धिमान राष्ट्र वही होता है, जो अपनी गलतियों से ही नहीं, बल्कि दूसरों के अनुभवों से भी सीख लेता है। यूरोप की तपती धरती भारत को यही संदेश दे रही है। यदि हमने समय रहते अपने विकास मॉडल को जलवायु के अनुरूप नहीं बदला, तो आने वाले वर्षों में हमारे सामने भी वही चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं, लेकिन यदि हमने आज सही निर्णय लिए तो विकसित भारत केवल आर्थिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे जलवायु-सक्षम और भविष्य के लिए तैयार राष्ट्र भी बन सकता है
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