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सीवरी के कीचड़ तट: मुंबई की तटीय जैवविविधता का अनमोल आवास

Wed, 01 Jul 2026 11:14 AM IST
Prachi Hatkar प्राची हटकर
Updated Wed, 01 Jul 2026 11:14 AM IST
सार

सीवरी कीचड़ तट मुंबई की तटीय जैवविविधता का अनमोल आवास है, जहां हजारों प्रवासी फ्लेमिंगो आते हैं। जानें इस पारिस्थितिकी का महत्व।

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Sewri Mudflats Mumbai The Hidden Coastal Ecosystem Hosting Thousands of Flamingos
सीवरी के कीचड़ तट- - फोटो : प्राची हटकर

विस्तार

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मुंबई जैसे घनी आबादी वाले महानगर के बीच, सीवरी के कीचड़ तट एक ऐसे प्राकृतिक संसार का द्वार खोलते हैं जहाँ शहर की गति कुछ पल के लिए ज्वार की लय के आगे थम जाती है। दूर से देखने पर ये तट साधारण, कीचड़ से भरे और लगभग खाली लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में ये अत्यंत समृद्ध और जीवंत तटीय आवास हैं, जो पक्षियों, सूक्ष्म जीवों और समुद्री जीवों की अनेक प्रजातियों को सहारा देते हैं। सीवरी के कीचड़ तटों की असली ताकत उनकी सूक्ष्म लेकिन बहुस्तरीय पारिस्थितिकी में छिपी है। यहाँ रहने वाले बेंथिक जीव जैसे पॉलीकीट, छोटे मोलस्क, क्रस्टेशियन और अन्य तल-निवासी जीव न केवल स्वयं इस आवास का हिस्सा हैं, बल्कि पक्षियों और मछलियों के लिए भोजन शृंखला की नींव भी बनते हैं। ज्वार के साथ आने-जाने वाला पानी पोषक तत्वों को बार-बार पुनर्वितरित करता है, जिससे यह क्षेत्र जैविक उत्पादन का एक सक्रिय केंद्र बन जाता है।

Sewri Mudflats Mumbai The Hidden Coastal Ecosystem Hosting Thousands of Flamingos
सीवरी के कीचड़ तट- मुंबई की तटीय जैवविविधता का अनमोल आवास - फोटो : निर्मिति लांभाटे

सीवरी के मडफ्लैट्स- पक्षियों का स्वर्ग

हर वर्ष सर्दियों के मौसम में सीवरी के ये तट हजारों प्रवासी फ्लेमिंगो पक्षियों के लिए सुरक्षित भोजन-स्थल बन जाते हैं। ये पक्षी अक्तूबर से मार्च के बीच यहां आते हैं और कम ज्वार के समय खुले हुए कीचड़ तटों पर भोजन करते हैं। इनके गुलाबी झुंड केवल देखने में सुंदर नहीं होते, बल्कि वे इस बात का संकेत भी हैं कि नीचे की तलछट में जीवन मौजूद है और भोजन की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है।

सीवरी के कीचड़ तटों की असली ताकत उनकी सूक्ष्म लेकिन बहुस्तरीय पारिस्थितिकी में छिपी है। यहां रहने वाले बेंथिक जीव जैसे पॉलीकीट, छोटे मोलस्क, क्रस्टेशियन और अन्य तल-निवासी जीव न केवल स्वयं इस आवास का हिस्सा हैं, बल्कि पक्षियों और मछलियों के लिए भोजन शृंखला की नींव भी बनते हैं। ज्वार के साथ आने-जाने वाला पानी पोषक तत्वों को बार-बार पुनर्वितरित करता है, जिससे यह क्षेत्र जैविक उत्पादन का एक सक्रिय केंद्र बन जाता है।

इन कीचड़ तटों के साथ लगे मैंग्रोव वन इस पारिस्थितिकी को और मजबूत बनाते हैं। मैंग्रोव तटों को स्थिर रखते हैं, तलछट को बांधते हैं, प्रदूषकों को कुछ हद तक रोकते हैं और किशोर मछलियों तथा अकशेरुकी जीवों के लिए आश्रय का काम करते हैं। सीवरी क्षेत्र की यह मडफ्लैट-मैंग्रोव निरंतरता मुंबई के तटीय तंत्र को लहरों, बाढ़ और तटीय क्षरण जैसी चुनौतियों से बचाने में भी मदद करती है।

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सीवरी के मडफ्लैट्स पर भोजन करते प्रवासी फ्लेमिंगो - फोटो : प्राची हटकर

शहरीकरण का खतरा और सीवरी की रक्षा की जरूरत

लेकिन यह प्राकृतिक तंत्र दबाव में है। मुंबई में बढ़ता शहरीकरण, बंदरगाह गतिविधियां, परिवहन परियोजनाएं, प्रदूषण और कचरे का अनियंत्रित प्रवेश इन आवासों की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। कई रिपोर्टों ने सीवरी के मैंग्रोव क्षेत्र को संवेदनशील और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण बताया है, फिर भी विकास परियोजनाओं के कारण इन पर जोखिम बना रहता है। जब तलछट की प्रकृति बदलती है या प्रदूषण बढ़ता है, तो सबसे पहले प्रभाव बेंथिक जीवों और फिर उन पर निर्भर पक्षियों पर दिखाई देता है।

सीवरी हमें यह याद दिलाता है कि शहर और प्रकृति के बीच की रेखा उतनी कठोर नहीं होती जितनी हम मान लेते हैं। यहाँ कीचड़, ज्वार, मैंग्रोव और पक्षी मिलकर एक ऐसा तटीय संसार रचते हैं जो मुंबई की पर्यावरणीय सहनशीलता के लिए अनमोल है।

यदि हम इन तटों को केवल खाली जमीन समझकर नष्ट कर देंगे, तो हम सिर्फ एक पक्षी-स्थल नहीं खोएंगे, बल्कि शहर की प्राकृतिक रक्षा-व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी खो देंगे। सीवरी के कीचड़ तटों की रक्षा केवल पक्षी-प्रेमियों या पर्यावरणविदों का मुद्दा नहीं है, यह मुंबई के भविष्य, उसकी जलवायु-लचीलापन क्षमता और उसकी जैव विविधता का प्रश्न है। शहर जहाँ ज्वार से मिलता है, वहीं हमें यह भी तय करना होगा कि हम प्रकृति को जगह देंगे या उसे किनारे कर देंगे

(प्राची हटकर एक समुद्री संरक्षण शोधकर्ता और शैक्षणिक विशेषज्ञ हैं, जिनका कार्य मुंबई एवं महाराष्ट्र के तटीय पारितंत्र, समुद्री जैवविविधता, मडफ्लैट्स, मैंग्रोव, समुद्री कछुओं, डुगोंग, समुद्री साँपों और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर केंद्रित है। वे क्षेत्रीय सर्वेक्षण, शोध-लेखन, और विज्ञान संचार के माध्यम से तटीय पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय योगदान देती हैं।)

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