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आज इधर, कल उधर!: 4 मई के बाद 180 डिग्री बदल गए ये 10 राजनीतिक रिश्ते
सार
लोकसभा चुनाव से पहले अभिनेत्री रचना बनर्जी, ममता बनर्जी के साथ मंच साझा करती थीं। ममता बनर्जी ने उनके साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और उन्हें चुनावी टिकट भी दिलाया। लेकिन 4 मई के बाद रचना बनर्जी ने कहा कि ममता सरकार के दौरान वह अपने संसदीय क्षेत्र में कोई काम नहीं कर सकीं।
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बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी
- फोटो : ANI
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विस्तार
संयुक्त परिवारों में रिश्तों के बनने-बिगड़ने की कहानियां अक्सर टीवी सिरियल्स में देखने को मिलती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति में 4 मई के बाद जो कुछ हुआ, वह किसी पॉलिटिकल ड्रामा से कम नहीं है। कोई कभी 'भाई' था, कोई 'बहन', कोई 'दोस्त'- लेकिन अब वे रिश्ते अतीत बन चुके हैं। वहीं कुछ धुर विरोधियों के बीच दूरियां कम होती दिखाई दे रही हैं।
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तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी हमेशा पार्टी को अपना "परिवार" कहती रही हैं। लेकिन समय के साथ इसी परिवार पर "परिवारवाद" का आरोप लगने लगा। पहले भी मतभेद थे, लेकिन उन्हें संभाल लिया जाता था। सियासी घटनाक्रम ने समीकरण ऐसे बदले कि अपने ही दल के कई करीबी नेताओं के बीच दूरियां बढ़ गईं, वहीं कल तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे नेता अब साथ-साथ कदम बढ़ाते दिख रहे हैं।
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10 प्रमुख राजनीतिक रिश्तों की कहानी:-
1. ममता बनर्जी-फिरहाद हकीम
मुकुल रॉय, शोभन चटर्जी और पार्थ चटर्जी के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद फिरहाद हकीम (बॉबी) ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे। ममता बनर्जी उनके हर प्रमुख कार्यक्रम में शामिल होती थीं और बॉबी भी भवानीपुर में रहकर उनके चुनाव अभियान का नेतृत्व करते थे।
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वह अक्सर कहते थे कि राजनीति में जो कुछ भी हैं, ममता बनर्जी की बदौलत हैं। 4 मई तक यही तस्वीर थी। लेकिन उसके बाद हालात तेजी से बदल गए। पहले उनकी बेटी प्रियदर्शिनी हकीम ने सोशल मीडिया पर संकेतपूर्ण पोस्ट किया।
फिर बॉबी ने ममता बनर्जी को बताए बिना नवान्न की बैठक में हिस्सा लिया, शुभेंदु अधिकारी के कार्यक्रम में पहुंचे, ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय से मुलाकात की और अंततः ममता बनर्जी से अलग बने नए तृणमूल संगठन में शामिल हो गए।
2. ममता बनर्जी-कजरी बंद्योपाध्याय
कजरी बंद्योपाध्याय, जो ममता बनर्जी की रिश्तेदार (भाभी) हैं, लंबे समय तक उनके बेहद करीबी मानी जाती थीं। भवानीपुर उपचुनाव में वह ममता बनर्जी की चुनाव एजेंट भी थीं और मीडिया के सामने लगातार उनका पक्ष रखती थीं। लेकिन 4 मई के बाद परिवार के भीतर भी राजनीतिक विभाजन दिखाई दिया। कजरी बंद्योपाध्याय, शुभेंदु अधिकारी के कार्यक्रम में पहुंचीं और मुख्यमंत्री की प्रशंसा भी की।
3. ममता बनर्जी-काकोली घोष दस्तीदार
काकोली घोष दस्तीदार और ममता बनर्जी का संबंध चार दशक पुराना माना जाता था। कठिन समय में काकोली घोष दस्तीदार और उनके परिवार ने ममता बनर्जी का साथ दिया था। बदले में ममता बनर्जी ने उन्हें और उनके पति को कई बार चुनावी टिकट और राजनीतिक जिम्मेदारियां दीं। लेकिन 4 मई के बाद यह रिश्ता भी पूरी तरह बदल गया। हालात यहां तक पहुंच गए कि काकोली घोष दस्तीदार के बेटे ने ममता बनर्जी द्वारा दिया गया उपहार वापस करने के लिए सीधे कालीघाट जाकर उसे लौटा दिया।
4. ममता बनर्जी-दीपक अधिकारी(देव)
अभिनेता और सांसद दीपक अधिकारी (देव) को राजनीति में बनाए रखने का श्रेय काफी हद तक ममता बनर्जी को दिया जाता रहा है। घाटाल मास्टर प्लान के लिए राज्य सरकार द्वारा धन आवंटित किए जाने का श्रेय भी देव अक्सर ममता बनर्जी को देते थे। जनवरी में उन्होंने सार्वजनिक रूप से उनका धन्यवाद भी किया था। लेकिन 4 मई के बाद उन्होंने नया राजनीतिक रुख अपनाया। उनके हस्ताक्षर नए राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़े दस्तावेजों में दिखाई दिए, जिससे उनके और ममता बनर्जी के रिश्तों में आई दूरी साफ नजर आने लगी।
5. ममता बनर्जी-रचना बनर्जी
लोकसभा चुनाव से पहले अभिनेत्री रचना बनर्जी, ममता बनर्जी के साथ मंच साझा करती थीं। ममता बनर्जी ने उनके साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और उन्हें चुनावी टिकट भी दिलाया। लेकिन 4 मई के बाद रचना बनर्जी ने कहा कि ममता सरकार के दौरान वह अपने संसदीय क्षेत्र में कोई काम नहीं कर सकीं। इस बयान ने दोनों के रिश्तों में आई दूरी को सार्वजनिक कर दिया।
पांच अहम राजनीतिक रिश्तों के बाद अब बात पांच अन्य राजनीतिक समीकरणों की
6. अभिषेक बनर्जी-ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय
एक समय ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय सार्वजनिक मंचों से कहते थे कि बंगाल में महाराष्ट्र जैसी स्थिति नहीं होगी और उनके नेता अभिषेक बनर्जी हैं। लेकिन अब वही ऋतोब्रत बंदोपाध्याय, अभिषेक बनर्जी पर तीखे हमले कर रहे हैं और उन्हें व्यंग्य में "चार्टर्ड अभिषेक" कहकर संबोधित करते हैं। दोनों के रिश्तों में पूरी तरह दरार आ चुकी है।
7. महुआ मोइत्रा-कल्याण बनर्जी
अगस्त 2025 में महुआ मोइत्रा और कल्याण बनर्जी के बीच तीखी बयानबाजी हुई थी। कल्याण बनर्जी ने महुआ मोइत्रा के पहनावे तक पर टिप्पणी की थी, जबकि महुआ मोइत्रा ने उन्हें महिला विरोधी बताया था। लेकिन 4 मई के बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। अब महुआ मोइत्रा उन्हें "बहुत भावुक इंसान" बताती हैं। दोनों की राजनीतिक लाइन एक जैसी हो गई है और वे एक साथ दिखाई देने लगे हैं।
8. महुआ मोइत्रा-सायनी घोष
महुआ मोइत्रा और सायनी घोष को लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस की मजबूत जोड़ी माना जाता था। संसद से लेकर चुनाव प्रचार तक दोनों साथ दिखाई देती थीं। महुआ मोइत्रा को सायनी घोष पर पूरा भरोसा था। लेकिन 4 मई के बाद अचानक सायनी घोष कुछ समय के लिए सार्वजनिक जीवन से दूर हो गईं। बाद में नए राजनीतिक घटनाक्रम में शामिल होने के बाद उन्होंने अलग रास्ता चुन लिया। महुआ मोइत्रा ने इसे व्यक्तिगत रूप से भी बड़ा आघात बताया।
9. रचना बनर्जी-असित मजूमदार
4 मई से पहले हुगली में सांसद रचना बनर्जी और विधायक असित मजूमदार के बीच गंभीर मतभेद थे। मामला इतना बढ़ा कि कल्याण बनर्जी को बीच-बचाव करना पड़ा। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद जब असित मजूमदार गिरफ्तार हुए तो रचना बनर्जी उनसे मिलने पहुंचीं। बाद में उन्होंने भी फिर एकबार अलग राजनीतिक खेमे का रुख कर लिया।
10. शताब्दी रॉय-अनुब्रत मंडल
बीरभूम जिले में अनुब्रत मंडल और सांसद शताब्दी रॉय के बीच लंबे समय तक तनाव रहा। ममता बनर्जी भी कई बार इस विवाद का जिक्र कर चुकी थीं। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद दोनों की राजनीतिक भाषा एक जैसी हो गई। दोनों अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व की आलोचना करते हुए एक ही सुर में बोल रहे हैं।
बहरहाल,कुल मिलाकर 4 मई के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में रिश्तों की नई तस्वीर सामने आई है। जहां वर्षों पुराने विश्वास और नजदीकियां टूट गईं, वहीं कई पुराने विरोधी एक मंच पर आ गए। यह बदलाव केवल राजनीतिक समीकरणों का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संबंधों के बदलते स्वरूप का भी संकेत देता है।
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