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जीवन धारा: जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं, लय में है; सूत्र- सहज बनें

Wed, 01 Jul 2026 08:43 AM IST
Pavan जॉर्ज सैंड
जॉर्ज सैंड Published by: Pavan Updated Wed, 01 Jul 2026 08:43 AM IST
सार

प्रकृति संसार की सबसे प्राचीन व सबसे धैर्यवान शिक्षक है। वह उपदेश या आदेश नहीं देती, सिर्फ मौजूद रहती है। उसकी यही मौन उपस्थिति मनुष्य के भीतर ऐसा बदलाव ला सकती है, जो हजारों शब्द भी नहीं कर पाते।

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Stream of Life: The meaning of life lies not in accumulation, but in flow; Key Principle- Be natural.
जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं, लय में है - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

मनुष्य ने अपने चारों ओर जितनी भी दीवारें खड़ी कर ली हों, उसकी आत्मा अब भी प्रकृति की संतान है। वह नगरों-महानगरों में रह सकता है, पत्थरों के बीच जीवन बिता सकता है, अपने जीवन को महत्वाकांक्षा और शोर से भर सकता है, पर उसके भीतर कहीं न कहीं एक मौन स्मृति भी जरूर जीवित रहती है। यह मौन स्मृति खुले आकाश की, बहती हुई हवा की या किसी नदी के किनारे की शांति की होती है। शायद यही कारण है कि जब जीवन बेहद मुश्किल और कृत्रिम लगने लगता है, तब मनुष्य अनायास ही प्रकृति की ओर लौटने को बेचैन हो उठता है, जैसे थका हुआ बच्चा अंततः अपनी मां की गोद में लौट आता है।
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प्रकृति संसार की सबसे प्राचीन व सबसे धैर्यवान शिक्षक है। वह उपदेश या आदेश नहीं देती, सिर्फ मौजूद रहती है। उसकी यही मौन उपस्थिति मनुष्य के भीतर ऐसा बदलाव ला सकती है, जो हजारों शब्द भी नहीं कर पाते। जब मैं किसी जंगल से गुजरती हूं, तो ऐसा लगता है, मानो पृथ्वी स्वयं धीरे-धीरे सांस ले रही हो। पेड़ों की शाखाएं हवा में जिस तरह से हिलती हैं, तब उनमें कोई उतावलापन नहीं होता। वे आकाश तक पहुंचने की आकांक्षा भी रखती हैं, पर साथ ही अपनी जड़ों को भी गहराई तक फैलाए रखती हैं।
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मनुष्य भी यदि प्रकृति से कुछ सीखना चाहे, तो शायद यही सबसे पहली शिक्षा होगी कि ऊंचा उठने की इच्छा रखो, पर अपनी जड़ों को मत भूलो। शहरों में लोग एक-दूसरे के करीब तो रहते हैं, पर आत्माएं दूर होती जाती हैं। हर व्यक्ति स्वयं को सिद्ध करने में लगा रहता है। हर चेहरा किसी भूमिका का अभिनय करता हुआ नजर आता है। प्रकृति इन सब कृत्रिमताओं को धो देती है। प्रकृति में कोई पाखंड नहीं है। फूल इसलिए नहीं खिलते कि कोई उनकी प्रशंसा करे। केवल मनुष्य ही है, जो निरंतर अपने अस्तित्व का प्रदर्शन करता रहता है।
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शायद इसी कारण प्रकृति के बीच मनुष्य का हृदय अधिक सरल हो जाता है। वहां उसे किसी मुखौटे की जरूरत नहीं रह जाती। प्रकृति सिखाती है कि जीवन का अर्थ संग्रह में नहीं, लय में है। ऋतुओं को देखिए। वसंत आकर चला जाता है। ग्रीष्म ऋतु के बाद वर्षा ठंडक देती है। पतझड़ पेड़ों को खाली कर देता है और शीत ऋतु सब कुछ स्थिर कर देती है। पर, प्रकृति कभी निराश नहीं होती। उसे पता है कि हर अंत में एक आरंभ छिपा है। मनुष्य यदि यह एक शिक्षा भी सीख ले, तो उसका आधा दुख समाप्त हो जाए। प्रकृति हमें प्रेम का अर्थ भी सिखाती है। प्रेम अधिकार नहीं है, जैसे सूर्य फूलों पर अधिकार नहीं जमाता। वह केवल उन्हें प्रकाश देता है। सच्चा प्रेम भी ऐसा ही होता है, वह दूसरे को खिलने देता है।

जब जीवन कठोर लगने लगे, जब संसार का शोर आपकी आत्मा को थका दे, तब कुछ समय प्रकृति के पास जाइए। पेड़ की छाया में बैठिए, मिट्टी की गंध महसूस कीजिए, हवा को अपने चेहरे पर बहने दीजिए। आप पाएंगे कि प्रकृति कोई उत्तर नहीं देती, फिर भी आपके भीतर के अनेक प्रश्न शांत हो जाते हैं।


सूत्र- सहज बनें
ऊंचाइयों को छूने की चाह जरूर रखें, पर अपनी जड़ों और सादगी को कभी न भूलें। ऋतुओं की तरह हर अंत में एक नई शुरुआत को देखना सीखें और संग्रह के बजाय जीवन को एक सुंदर लय में जिएं। सच्चा प्रेम अधिकार जताने में नहीं, बल्कि सूर्य की तरह दूसरों को खिलने का अवसर देने में है। जब भी भीतर का शोर थकाए, प्रकृति के मौन में जाएं।
 
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