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ब्लॉग: जीवन का सबसे सार्थक अध्याय, गौरवमयी उपलब्धि के रूप में स्वीकार करें वृद्धावस्था
जेम्स हिलमैन
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 20 Feb 2026 05:40 AM IST
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सार
वृद्धावस्था को बोझ मानने के बजाय एक गौरवमयी उपलब्धि के रूप में स्वीकार करें, क्योंकि आपकी परिपक्वता ही वह अंतिम उपहार है, जो आप इस संसार को दे सकते हैं। जीवन का अंतिम अध्याय वास्तव में सबसे अधिक सार्थक और प्रभावशाली हो सकता है।
वृद्धावस्था (प्रतीकात्मक)
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अक्सर समाज हमें यह महसूस कराता है कि वृद्धावस्था जीवन की वह शाम है, जहां ऊर्जा और उपयोगिता समाप्त होने लगती है। लेकिन जिंदगी का यह पड़ाव केवल शरीर के कमजोर होने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि चरित्र के निखार की अवस्था है। जैसे एक पुराने पेड़ की छाल जितनी खुरदरी होती है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी और उसकी छाया उतनी ही शीतल होती है, वैसे ही उम्र का बढ़ना वास्तव में आपके चरित्र के पूर्णता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है।
जिस प्रकार एक पुरानी इमारत के पत्थर अपनी रगड़ और दरारों के बावजूद मजबूती और इतिहास का परिचय देते हैं, ठीक उसी तरह वृद्धावस्था में चेहरे की झुर्रियां जीवन के उन अनुभवों का प्रमाण हैं, जिन्होंने हमें गढ़ा है। यह वह अवस्था है, जहां हम अंततः उस सांचे में ढल जाते हैं, जिसके लिए प्रकृति ने हमें बनाया था। वृद्धावस्था ही वह समय होता है, जब ‘आप क्या करते हैं’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘आप कौन हैं’ हो जाता है।
दरअसल वृद्धावस्था में ही प्रकृति हमें वह समय और एकाग्रता प्रदान करती है, जिससे हम अपने भीतर झांक सकें और अपनी यादों को एक नए अर्थ के साथ संजो सकें। यादों का यह खजाना अतीत में भटकना नहीं है, बल्कि यह जीवन की पूरी यात्रा को एक सूत्र में पिरोकर उसके सार को समझने की एक आध्यात्मिक साधना है।
मेरा मानना है कि उम्र बढ़ने का उद्देश्य केवल मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं है, बल्कि अपने ‘अस्तित्व के सार’ को पूरी तरह से प्रकट करना है, जो जवानी की भागदौड़ में कहीं ओझल हो गया था। इस उम्र में आपकी उपस्थिति, स्थिरता और शांति नई पीढ़ी के लिए एक ठंडी छांव की तरह काम करती है।
अतः उम्र के इस पड़ाव को बोझ मानने के बजाय एक गौरवमयी उपलब्धि के रूप में स्वीकार करें, क्योंकि आपकी परिपक्वता ही वह अंतिम उपहार है, जो आप इस संसार को दे सकते हैं। आपकी चेतना व अनुभव का विस्तार असीम है, जो सिद्ध करता है कि जीवन का अंतिम अध्याय वास्तव में सबसे अधिक सार्थक और प्रभावशाली हो सकता है।
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जिस प्रकार एक पुरानी इमारत के पत्थर अपनी रगड़ और दरारों के बावजूद मजबूती और इतिहास का परिचय देते हैं, ठीक उसी तरह वृद्धावस्था में चेहरे की झुर्रियां जीवन के उन अनुभवों का प्रमाण हैं, जिन्होंने हमें गढ़ा है। यह वह अवस्था है, जहां हम अंततः उस सांचे में ढल जाते हैं, जिसके लिए प्रकृति ने हमें बनाया था। वृद्धावस्था ही वह समय होता है, जब ‘आप क्या करते हैं’ से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘आप कौन हैं’ हो जाता है।
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दरअसल वृद्धावस्था में ही प्रकृति हमें वह समय और एकाग्रता प्रदान करती है, जिससे हम अपने भीतर झांक सकें और अपनी यादों को एक नए अर्थ के साथ संजो सकें। यादों का यह खजाना अतीत में भटकना नहीं है, बल्कि यह जीवन की पूरी यात्रा को एक सूत्र में पिरोकर उसके सार को समझने की एक आध्यात्मिक साधना है।
मेरा मानना है कि उम्र बढ़ने का उद्देश्य केवल मृत्यु की प्रतीक्षा करना नहीं है, बल्कि अपने ‘अस्तित्व के सार’ को पूरी तरह से प्रकट करना है, जो जवानी की भागदौड़ में कहीं ओझल हो गया था। इस उम्र में आपकी उपस्थिति, स्थिरता और शांति नई पीढ़ी के लिए एक ठंडी छांव की तरह काम करती है।
अतः उम्र के इस पड़ाव को बोझ मानने के बजाय एक गौरवमयी उपलब्धि के रूप में स्वीकार करें, क्योंकि आपकी परिपक्वता ही वह अंतिम उपहार है, जो आप इस संसार को दे सकते हैं। आपकी चेतना व अनुभव का विस्तार असीम है, जो सिद्ध करता है कि जीवन का अंतिम अध्याय वास्तव में सबसे अधिक सार्थक और प्रभावशाली हो सकता है।