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अपहरण, दरिंदगी और कत्ल: 'पुलिस अंकल गंदे हैं, दीदी को मार डाला', मासूम की बहनों की बातें सुन भर आती हैं आंखें

Sat, 01 Aug 2026 03:59 PM IST
Sharukh Khan अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर Published by: Sharukh Khan Updated Sat, 01 Aug 2026 03:59 PM IST
सार

गोरखपुर जिला अस्पताल में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अस्पताल में सुरक्षा के लिए दिन और रात की पाली मिलाकर 29 महिला एवं पुरुष सुरक्षा गार्ड तैनात किए जाते हैं। इसके अलावा परिसर की निगरानी के लिए 20 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं लेकिन इसके बावजूद मासूम के अपहरण और हत्या की वारदात ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी।

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Gorakhpur Kidnapping brutality and murder Police Uncle is bad he killed Didi hearing words of victim sisters
Gorakhpur Child Murder - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पुलिस अंकल गंदे हैं... दीदी को बाइक पर बैठाकर ले गए और उसे मार डाला। दीदी रोज मुझे पेंटिंग करना सिखाती थी। उसका बैग अब मेरे पास है। मैं कॉपी-किताब से पढ़ूंगी।10 साल की बच्ची की छोटी बहनों के मुंह से निकले ये शब्द सुनकर हर कोई भावुक हो जा रहा है। यूपी के गोरखपुर जिले में सिपाही की हैवानियत की शिकार हुई मासूम अब परिवार के बीच नहीं है लेकिन उसकी यादें घर के हर कोने में मौजूद हैं। पांच और सात साल की छोटी बहनें अपनी दीदी का स्कूल बैग लेकर खेल रही हैं। 
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पूछने पर मासूमियत से कहती हैं कि दीदी ऊपर चली गई हैं। बरामदे में रखी स्कूल यूनिफाॅर्म ड्रेस और बैग को देखकर बार-बार अपनी बहन को याद कर रही हैं। घर की हालत ऐसी है कि दोनों छोटी बच्चियां भूख-प्यास में भटक रही हैं। आसपास से गुजरने वाले लोग उन्हें चिप्स और खाने के सामान देकर चले जाते हैं। वहीं 13 साल की बड़ी बहन जिला अस्पताल में भर्ती मां की देखभाल कर रही है।
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डॉक्टर बनना चाहती थी मासूम
10 वर्षीय मासूम डॉक्टर बनना चाहती थी। परिवार के अनुसार, मां से वह कहती थी कि बड़ी होकर उनका इलाज करेगी। परिवार को उम्मीद थी एक दिन यही बेटी घर की तकदीर बदलेगी लेकिन उससे पहले ही उसकी जिंदगी छिन गई। मासूम की मौत ने एक साधारण परिवार की दुनिया उजाड़ दी। परिवार में पहले सात सदस्य थे लेकिन इस घटना के बाद अब छह ही बचे हैं। पिता ई-रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाते हैं, जबकि मां गृहिणी हैं और लंबे समय से अस्वस्थ रहती हैं। 
 

परिवार की एक मौसी जिला अस्पताल में नर्स हैं। आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने बेटियों की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी। मासूम निजी स्कूल में पांचवीं कक्षा की छात्रा थी। वह पढ़ाई में रुचि रखती थी और डॉक्टर बनने का सपना देखती थी। पड़ोसियों के मुताबिक, परिवार की सभी बेटियां बेहद जिम्मेदार थीं। स्कूल से लौटने के बाद वे घर के कामों में माता-पिता का हाथ बंटाती थीं। मां की तबीयत खराब होने पर बहनें मिलकर खाना बनातीं, घर संभालतीं और छोटे-बड़े सभी काम करती थीं। मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने वाली मासूम भी हर जिम्मेदारी में आगे रहती थी।
 
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बेटी को गंवाने की पीड़ा...महसूस नहीं कर सके बेटे के जन्म की खुशी
नियति के खेल भी निराले हैं... घर में पांच बेटियों के बाद बेटे का जन्म हुआ लेकिन हालात ऐसे कि यह खुशी महसूस नहीं की जा सकी। दरिंदगी की शिकार हुई 10 साल की बिटिया का परिवार के लोगों ने बृहस्पतिवार की सुबह अंतिम संस्कार किया था। देर शाम अस्पताल से बेटे के जन्म की खबर मिली। बिटिया से हुई हैवानियत के गम के बोझ तले दबे परिवार के लिए बेटे की आमद के उत्सव का अवसर भी फीका रहा।

जिस बेटी को नौ महीने गर्भ में पाला और 10 साल तक अपने आंचल की छांव में हर दुख से बचाकर रखा उसके साथ हुई अमानवीयता ने मां को कभी न खत्म होने वाला दर्द दिया है। बिटिया को गंवाने की तकलीफ में डूबी गर्भवती मां की तबीयत बृहस्पतिवार की सुबह बिगड़ गई थी जैसे-तैसे उसे संभाला गया। इस बीच बिटिया के अंतिम संस्कार की तैयारियां भी होती रहीं। 

उधर, प्रसव पीड़ा होने पर मां किसी भी कीमत पर अस्पताल जाने के लिए तैयार नहीं थी। काफी समझा-बुझाकर उसे कोतवाली थाना क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां रात 9:30 बजे बेटे का जन्म हुआ। मां की आंख खुली तो बेटे को देख खुश होने के बजाय उसकी आंखें फिर छलक पड़ीं। मां बोली- भाई के पैदा होने का इंतजार कर रही थी, उसके आने से पहले ही चली गई। बाहर बेटियों के साथ मौजूद पिता फफक पड़े। कहने लगे कि सभी बहनों के साथ वह भी भाई के आने का इंतजार कर रही थी। 

कह रही थी कि इस साल रक्षाबंधन पर वह भी अपने भाई को राखी बांधेगी। पिता ने बताया कि पांच बेटियों के बाद सभी की चाह थी कि एक बेटा हो जाए। इस बार जैसे सभी को यह भरोसा था कि बेटा ही होगा। हम सब बहुत खुश थे। अगवा होने वाले दिन ही सुबह उसने बहन को खाना देने जाने से पहले मां को दुलारते हुए कहा था कि इस बार हमारे यहां भाई आएगा। यह कहते हुए पिता के साथ ही खड़ीं सभी बेटियां रोने लगीं और उन्हें संभालना मुश्किल हो गया।
 

होमवर्क पूरा करने की जल्दी में थी मासूम
28 जुलाई को घटना वाले दिन भी मासूम रोज की तरह स्कूल गई थी। छुट्टी के बाद घर लौटकर उसने कपड़े बदले और यूनिफॉर्म बरामदे में टांग दी। लोवर-टीशर्ट पहनकर खेलने लगी। शाम को बड़ी बहन के सीने में दर्द होने पर उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। पिता और मौसी अस्पताल में उसके साथ थे। 

 

घर पर मौजूद बच्ची ने खाना बनाया और रात में 7 साल की छोटी बहन को साथ लेकर अस्पताल खाना पहुंचाने गई। पिता के मुताबिक, बच्ची को अपना होमवर्क पूरा करना था, इसलिए वह जल्द घर लौटना चाहती थी। लेकिन उसके बाद हुई घटना ने पूरे परिवार को कभी न भरने वाला जख्म दे दिया।

मोमबत्ती जलाकर मासूमों को दी श्रद्धांजलि
गोरखपुर के खजनी क्षेत्र के मासूम छात्र वैभव वर्मा और तिवारीपुर क्षेत्र की मासूम बिटिया की जघन्य हत्या और हैवानियत के विरोध में आवास विकास कॉलोनी, कुनराघाट से शहीद गौतम गुरुंग की प्रतिमा तक पद यात्रा निकाल मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि दी गई।

 

प्रताप वाहिनी के अध्यक्ष व भाजपा नेता राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि मानवता को शर्मशार करने वाली घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए वैभव वर्मा और बिटिया विहिका के हत्यारों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में जल्दी सुनवाई कर फांसी की सजा देनी चाहिए। उन्होंने प्रदेश सरकार से दोनों परिवार को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की मांग की। इस मौके पर आशीष वर्मा, मनोज शुक्ल, बलिराम यादव, धीरज पांडेय व गोलू चौरसिया समेत कई लोग मौजूद रहे।
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