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Gorakhpur News: गुणसूत्र जांच में लापरवाही से बढ़ रहा दिव्यांगता का खतरा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Fri, 03 Apr 2026 02:40 AM IST
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एम्स में आने वाली गर्भवतियों की जांच में सामने आई जानकारी
ड्यूल मार्कर टेस्ट और लेवल टू अल्ट्रासाउंड जांच से पता चलती हैं क्रोमोजोमल बीमारियां
गोरखपुर। पूर्वांचल में गर्भावस्था के दौरान आवश्यक गुणसूत्र जांच के प्रति जागरूकता की कमी नवजातों में दिव्यांगता के खतरे को बढ़ा रही है। एम्स में आने वाली गर्भवती महिलाओं की जांच में यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है कि करीब 35 फीसदी महिलाएं इस जरूरी जांच से अनजान हैं।
एम्स के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग के अनुसार, ड्यूल मार्कर टेस्ट और लेवल-टू अल्ट्रासाउंड जांच क्रोमोजोमल बीमारियों की पहचान के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे प्रभावी मानी जाती हैं। इन जांचों के जरिये गर्भ में पल रहे शिशु में होने वाली गंभीर बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है, जिससे नवजात को दिव्यांगता से बचाया जा सकता है।
एम्स की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आराधना सिंह ने बताया कि हर गर्भावस्था में यह जोखिम बना रहता है कि शिशु का विकास सामान्य है या नहीं। यदि माता या पिता में किसी प्रकार की क्रोमोजोमल बीमारी है, तो शिशु में दिव्यांगता का खतरा 95 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
उन्होंने बताया कि ड्यूल मार्कर टेस्ट गर्भधारण के पहले तीन महीनों में कराना बेहद जरूरी है। यदि यह जांच छूट जाए, तो पांचवें महीने में लेवल-टू अल्ट्रासाउंड अवश्य कराना चाहिए। इन जांचों से डाउन सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21) और एडवर्ड सिंड्रोम (ट्राइसोमी 18) जैसी असामान्यताओं का समय रहते पता चल जाता है।
लेवल-टू अल्ट्रासाउंड जांच के जरिये शिशु के अंगों जैसे मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, गुर्दे और रीढ़ की हड्डी के विकास की भी विस्तृत जानकारी मिलती है। इसके साथ ही कटे होंठ, हृदय दोष और रीढ़ संबंधी समस्याओं का भी पता लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, क्रोमोजोमल बीमारियां आनुवांशिक विकार होती हैं, जो गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में बदलाव के कारण उत्पन्न होती हैं। सामान्यत: हर व्यक्ति में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) होते हैं। इनमें गड़बड़ी होने पर डाउन सिंड्रोम, टर्नर सिंड्रोम और क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
एम्स के विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच कराने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने की अपील की है, ताकि नवजातों को गंभीर बीमारियों और दिव्यांगता से बचाया जा सके।
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ड्यूल मार्कर टेस्ट और लेवल टू अल्ट्रासाउंड जांच से पता चलती हैं क्रोमोजोमल बीमारियां
गोरखपुर। पूर्वांचल में गर्भावस्था के दौरान आवश्यक गुणसूत्र जांच के प्रति जागरूकता की कमी नवजातों में दिव्यांगता के खतरे को बढ़ा रही है। एम्स में आने वाली गर्भवती महिलाओं की जांच में यह चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है कि करीब 35 फीसदी महिलाएं इस जरूरी जांच से अनजान हैं।
एम्स के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग के अनुसार, ड्यूल मार्कर टेस्ट और लेवल-टू अल्ट्रासाउंड जांच क्रोमोजोमल बीमारियों की पहचान के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे प्रभावी मानी जाती हैं। इन जांचों के जरिये गर्भ में पल रहे शिशु में होने वाली गंभीर बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है, जिससे नवजात को दिव्यांगता से बचाया जा सकता है।
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एम्स की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. आराधना सिंह ने बताया कि हर गर्भावस्था में यह जोखिम बना रहता है कि शिशु का विकास सामान्य है या नहीं। यदि माता या पिता में किसी प्रकार की क्रोमोजोमल बीमारी है, तो शिशु में दिव्यांगता का खतरा 95 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
उन्होंने बताया कि ड्यूल मार्कर टेस्ट गर्भधारण के पहले तीन महीनों में कराना बेहद जरूरी है। यदि यह जांच छूट जाए, तो पांचवें महीने में लेवल-टू अल्ट्रासाउंड अवश्य कराना चाहिए। इन जांचों से डाउन सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21) और एडवर्ड सिंड्रोम (ट्राइसोमी 18) जैसी असामान्यताओं का समय रहते पता चल जाता है।
लेवल-टू अल्ट्रासाउंड जांच के जरिये शिशु के अंगों जैसे मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, गुर्दे और रीढ़ की हड्डी के विकास की भी विस्तृत जानकारी मिलती है। इसके साथ ही कटे होंठ, हृदय दोष और रीढ़ संबंधी समस्याओं का भी पता लगाया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, क्रोमोजोमल बीमारियां आनुवांशिक विकार होती हैं, जो गुणसूत्रों की संख्या या संरचना में बदलाव के कारण उत्पन्न होती हैं। सामान्यत: हर व्यक्ति में 46 गुणसूत्र (23 जोड़े) होते हैं। इनमें गड़बड़ी होने पर डाउन सिंड्रोम, टर्नर सिंड्रोम और क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
एम्स के विशेषज्ञों ने गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच कराने और चिकित्सकीय सलाह का पालन करने की अपील की है, ताकि नवजातों को गंभीर बीमारियों और दिव्यांगता से बचाया जा सके।