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फिस्टुला: इलाज में नई उम्मीद, एम्स करेगा कारगर दवा की पहचान
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मरीजों पर एम्स में किया जा रहा शोध, पूर्वांचल और बिहार में मरीज अपेक्षाकृत अधिक
गोरखपुर। पूर्वांचल और बिहार में तेजी से बढ़ रहे फिस्टुला (बवासीर) के मामलों को देखते हुए एम्स ने मरीजों पर दवाओं के प्रभाव को लेकर व्यापक शोध शुरू किया है। इस शोध के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि किन मरीजों पर दवा प्रभावी होगी और किन्हें सर्जरी की आवश्यकता पड़ेगी।
एम्स के सर्जरी विभाग की ओपीडी में फिस्टुला के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वांचल और बिहार के लोगों के खानपान में अत्यधिक मसाले और तीखे पदार्थों का उपयोग इस बीमारी के प्रमुख कारणों में शामिल है। सर्जरी विभाग के डॉ. हरिकेश यादव ने बताया कि मरीजों के खानपान से जुड़ा विस्तृत डाटा एकत्र किया जा रहा है। इसमें यह विश्लेषण किया जा रहा है कि लोग किन मसालों का उपयोग करते हैं और उनमें मिर्च की मात्रा कितनी होती है। इसी आधार पर मरीजों को दवाएं दी जा रही हैं, जिनका असर धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
शोध के दौरान यह भी सामने आया है कि कुछ मरीजों की स्थिति इतनी गंभीर होती है कि उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ती है। वहीं, लगभग 10 से 15 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी अनुवांशिक कारणों से भी होती है।
चिंताजनक बात यह है कि नए मामलों में 35 से 40 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की संख्या अधिक है। हालांकि, दक्षिण भारत में मसालों का अधिक उपयोग होने के बावजूद वहां इस बीमारी के मरीज अपेक्षाकृत कम हैं, जो शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है। एम्स के डॉक्टरों ने लोगों को सलाह दी है कि वे संतुलित आहार अपनाएं, अधिक मसाले और तीखे भोजन से बचें और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें। समय पर इलाज से इस बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।
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गोरखपुर। पूर्वांचल और बिहार में तेजी से बढ़ रहे फिस्टुला (बवासीर) के मामलों को देखते हुए एम्स ने मरीजों पर दवाओं के प्रभाव को लेकर व्यापक शोध शुरू किया है। इस शोध के माध्यम से यह पता लगाया जाएगा कि किन मरीजों पर दवा प्रभावी होगी और किन्हें सर्जरी की आवश्यकता पड़ेगी।
एम्स के सर्जरी विभाग की ओपीडी में फिस्टुला के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वांचल और बिहार के लोगों के खानपान में अत्यधिक मसाले और तीखे पदार्थों का उपयोग इस बीमारी के प्रमुख कारणों में शामिल है। सर्जरी विभाग के डॉ. हरिकेश यादव ने बताया कि मरीजों के खानपान से जुड़ा विस्तृत डाटा एकत्र किया जा रहा है। इसमें यह विश्लेषण किया जा रहा है कि लोग किन मसालों का उपयोग करते हैं और उनमें मिर्च की मात्रा कितनी होती है। इसी आधार पर मरीजों को दवाएं दी जा रही हैं, जिनका असर धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
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शोध के दौरान यह भी सामने आया है कि कुछ मरीजों की स्थिति इतनी गंभीर होती है कि उन्हें सर्जरी की जरूरत पड़ती है। वहीं, लगभग 10 से 15 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी अनुवांशिक कारणों से भी होती है।
चिंताजनक बात यह है कि नए मामलों में 35 से 40 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की संख्या अधिक है। हालांकि, दक्षिण भारत में मसालों का अधिक उपयोग होने के बावजूद वहां इस बीमारी के मरीज अपेक्षाकृत कम हैं, जो शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है। एम्स के डॉक्टरों ने लोगों को सलाह दी है कि वे संतुलित आहार अपनाएं, अधिक मसाले और तीखे भोजन से बचें और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें। समय पर इलाज से इस बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।