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Gorakhpur News: तदबीर से बदली तकदीर... सामान्य किसान से हनीमैन बने राजू
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गोरखपुर। जीवन में असफलता से निराश न होकर पीपीगंज के राजू सिंह ने अपनी तदबीर से कामयाबी की नई इबारत लिख दी। तकरीबन 34 साल पहले परंपरागत खेती से हटकर टमाटर की खेती में जोर-आजमाइश की। मनमुताबिक मुनाफा नहीं आया तो कुछ अलग करने की फैसला किया। इसके बाद मधुमक्खी पालन कर शहद का बिजनेस शुरू किया। आज एक साल में 30 टन शहद का उत्पादन करते हैं और उनका सालाना टर्नओवर तीन करोड़ का है। शहद उत्पादन के साथ यूपी के कई जिलों में मधुमक्खी की सप्लाई भी कर रहे हैं। पूरे क्षेत्र में उन्हें लोग हनीमैन के नाम से जानते हैं।
पीपीगंज के हरपुर गांव निवासी राजू सिंह बताते हैं कि वर्ष 1992 में सिर्फ दो बॉक्स से मधुमक्खी पालन की शुरुआत की आज 2000 बॉक्स तक ये संख्या पहुंच गई है। राजू सिंह बताते हैं, टमाटर की खेती में अक्सर बेहतर भाव नहीं मिलता था और कच्चा सौदा होने के चलते औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता था। फिर उन्होंने सोचा कि ऐसा बिजनेस शुरू करें जो कुछ दिन रखने के बाद भी खराब न हो। उनके किसी ने परिचित ने मधुमक्खी पालन का आइडिया दिया। वे ट्रेनिंग लेने ज्योलीकोट, नैनीताल में स्थित राजकीय मधुमक्खी पालन (मौन) केंद्र गए फिर मधुमक्खी पालन शुरू कर दिया। मधुमक्खी पालन व शहद संचयन के कार्य को पूरी लगन और वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा दिया। उन्हाेंने बताया कि एक संदूक (बाक्स) से 40-50 किलो शहद का उत्पादन एक सीजन में होता है।
सरसों की फसल कटने के बाद बाराबंकी में करते हैं मधुमक्खी पालन
राजू सिंह ने बताया कि मस्टर्ड हनी सरसों के फूल से प्राप्त शहद होता है। इसका ज्यादा मात्रा में होने का मुख्य कारण है कि सरसों का सीजन बड़ा होता है। दिसंबर से मार्च के बीच गोरखपुर में और फिर बाराबंकी में शिफ्ट हो जाते हैं। वहां लीज पर बगीचा लेते हैं। राजू का कहना है कि बाराबंकी में मक्का, बाजरा दलहनी फसलों के साथ ही सब्जियों की खेती ज्यादा होती है। इनके फूलों से वे मकरंद और परागकण एकत्र करती हैं।
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मधुमक्खी निकालने का आधुनिक तरीका विकसित किया
राजू सिंह और उनके पुत्र आदर्श सिंह ने ''''फ्लो बी हाइव'''' नामक आधुनिक मधुमक्खी पालन तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से मधुमक्खियों को बिना नुकसान पहुंचाए और बिना बॉक्स खोले शुद्ध शहद निकाला जाता है। धुएं की मदद और फ्रेम निकालने का झंझट नहीं है इससे मधुमक्खी को नुकसान नहीं होता है। गोरखपुर महोत्सव 2026 में इसे प्रदर्शित भी किया गया था, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस तकनीक को सराहा था।
तीन साल पहले प्रोसेसिंग यूनिट लगाई, ऑनलाइन बेचते हैं शहद
राजू सिंह ने अपने घर पर ही तीन साल पहले प्रोसेसिंग यूनिट लगाई और खुद उत्पादन करने के बाद पैकेजिंग भी करते हैं। वे बताते हैं, एक किलो शहद 500 रुपये किलो बिक जाता है। बहुत सारे लोग आकर ले जाते हैं और ऑनलाइन भी आर्डर देकर लोग मंगाते हैं।
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पीपीगंज के हरपुर गांव निवासी राजू सिंह बताते हैं कि वर्ष 1992 में सिर्फ दो बॉक्स से मधुमक्खी पालन की शुरुआत की आज 2000 बॉक्स तक ये संख्या पहुंच गई है। राजू सिंह बताते हैं, टमाटर की खेती में अक्सर बेहतर भाव नहीं मिलता था और कच्चा सौदा होने के चलते औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता था। फिर उन्होंने सोचा कि ऐसा बिजनेस शुरू करें जो कुछ दिन रखने के बाद भी खराब न हो। उनके किसी ने परिचित ने मधुमक्खी पालन का आइडिया दिया। वे ट्रेनिंग लेने ज्योलीकोट, नैनीताल में स्थित राजकीय मधुमक्खी पालन (मौन) केंद्र गए फिर मधुमक्खी पालन शुरू कर दिया। मधुमक्खी पालन व शहद संचयन के कार्य को पूरी लगन और वैज्ञानिक तरीके से बढ़ावा दिया। उन्हाेंने बताया कि एक संदूक (बाक्स) से 40-50 किलो शहद का उत्पादन एक सीजन में होता है।
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सरसों की फसल कटने के बाद बाराबंकी में करते हैं मधुमक्खी पालन
राजू सिंह ने बताया कि मस्टर्ड हनी सरसों के फूल से प्राप्त शहद होता है। इसका ज्यादा मात्रा में होने का मुख्य कारण है कि सरसों का सीजन बड़ा होता है। दिसंबर से मार्च के बीच गोरखपुर में और फिर बाराबंकी में शिफ्ट हो जाते हैं। वहां लीज पर बगीचा लेते हैं। राजू का कहना है कि बाराबंकी में मक्का, बाजरा दलहनी फसलों के साथ ही सब्जियों की खेती ज्यादा होती है। इनके फूलों से वे मकरंद और परागकण एकत्र करती हैं।
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मधुमक्खी निकालने का आधुनिक तरीका विकसित किया
राजू सिंह और उनके पुत्र आदर्श सिंह ने ''''फ्लो बी हाइव'''' नामक आधुनिक मधुमक्खी पालन तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से मधुमक्खियों को बिना नुकसान पहुंचाए और बिना बॉक्स खोले शुद्ध शहद निकाला जाता है। धुएं की मदद और फ्रेम निकालने का झंझट नहीं है इससे मधुमक्खी को नुकसान नहीं होता है। गोरखपुर महोत्सव 2026 में इसे प्रदर्शित भी किया गया था, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस तकनीक को सराहा था।
तीन साल पहले प्रोसेसिंग यूनिट लगाई, ऑनलाइन बेचते हैं शहद
राजू सिंह ने अपने घर पर ही तीन साल पहले प्रोसेसिंग यूनिट लगाई और खुद उत्पादन करने के बाद पैकेजिंग भी करते हैं। वे बताते हैं, एक किलो शहद 500 रुपये किलो बिक जाता है। बहुत सारे लोग आकर ले जाते हैं और ऑनलाइन भी आर्डर देकर लोग मंगाते हैं।