सुना है क्या: पहचान छिपाकर खा रहे मलाई, साथ ही 'मुखिया सब बदलने में जुटे और आसान नहीं काम निकलवाना' के किस्से
यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'पहचान छिपाकर मलाई खा रहे सर...' की कहानी। इसके अलावा 'मुखिया सब बदल डालने में जुटे' और 'आसान नहीं साहब से काम निकलवाना' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
पहचान छिपाकर मलाई खा रहे सर...
राजस्व जुटाने वाले एक महकमे में आई तबादला सूची का बवंडर अंदरखाने शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। तबादलों के बहाने किनारे कर दिए गए अफसरों का कहना है कि अपनों पर करम और गैरों पर सितम किया गया है। चर्चा है कि ‘सिंह इज किंग’ बनकर नियमों को चिढ़ाते हुए कुछ अधिकारी फिर पश्चिम के मलाईदार जिले में तैनाती पा गए हैं। इतना ही नहीं...चर्चाओं का स्तर यहां तक आ पहुंच है कि ऐसे अफसरों के बारे में कहा जा रहा है कि ये 17 से पहले वाली सरकार के खास रहे हैं और फिर सक्रिय हो गए हैं। वहीं दूसरे धड़े का कहना है कि जांच हो जाए तो दूध का दूध...पानी का पानी हो जाए।
मुखिया सब बदल डालने में जुटे
प्रदेश में उच्च स्तर की पढ़ाई कराने वाले संस्थानों में हाल के दिनों में हुए समारोह इस बार काफी चर्चा में रहे हैं। इन संस्थानों की मुखिया ने सबकी कमियों का आइना दिखाया तो इसके बाद से अब अंदरखाने हड़कंप भी मचा हुआ है। एक संस्थान के मुखिया तो इस डांट से इतना खिन्न हैं कि वे सब कुछ बदल डालने में ही जुट गए हैं। एक-एक कर उन्होंने अपने यहां के कई प्रमुख अधिकारियों को बदल डाला है। ऐसे में उनकी इस कार्रवाई से परिसर में चर्चाओं का बाजार गर्म है।
आसान नहीं साहब से काम निकलवाना
सूबे के खेल-कूद महकमे के एक साहब अपनी कार्यशैली की वजह से खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं। दरअसल साहब को किसी काम को सुलझाने के बजाय उलझाने में महारत हासिल है। लिहाजा महकमे में मातहत अब साहब के पास अपनी समस्या सुलझाने की अर्जी लेकर तो जाते हैं, लेकिन लौटते हैं उलझनों के साथ। छोटी-से-छोटी समस्या को साहब इतना बड़ा बना देते हैं कि लोग अब कतराने लगे हैं। साहब लंबित मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया इतनी लंबी बना देते हैं कि काम से संबंधित फाइल भी हांफने लगी है। उच्चाधिकारी कई बार साहब को समझा भी चुके हैं, लेकिन साहब ठहरे अपनी धुन के पक्के।