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UP: सैन्यकर्मियों के ड्राइविंग लाइसेंस के लिए आरटीओ की अनिवार्यता खत्म, जांच की प्रक्रिया से भी मिलेगी मुक्ति
Sat, 01 Aug 2026 09:57 PM IST
रोहित मिश्र
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Sat, 01 Aug 2026 09:57 PM IST
सार
Driving License in UP: सैन्यकर्मियों के लिए बनने वाले ड्राइविंग लाइसेंस में आरटीओ की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। इससे सैन्यकर्मियों के लिए सुविधा बढ़ेगी।
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ड्राइविंग लाइसेंस
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
सैन्यकर्मियों के लिए बनने वाले ड्राइविंग लाइसेंस में आरटीओ की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है। आटो अप्रवूल लागू होने से जांच की प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा। चूंकि सेना व परिवहन विभाग के एपीआई लिंक नहीं है, इसलिए फर्जीवाड़े की आशंका बढ़ गई है।
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दरअसल, सैन्यकर्मियों के लिए डिफेंस डीएल बनाया जाता है। परिवहन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सेना में ड्राइवर पद पर भर्ती होने वालों का प्रशिक्षण सेना ही करवाती है तथा डीएल भी बनाकर देती है। लेकिन यह डीएल सैन्य वाहनों को चलाने तक ही सीमित होता है। सैन्य क्षेत्र के बाहर सामान्य वाहन चलाने के लिए सैन्यकर्मियों को आरटीओ से डीएल बनवाना होता है। हालांकि डिफेंस डीएल होने के बाद सामान्य डीएल में उन्हें लर्नर नहीं बनवाना पड़ता था परमानेंट डीएल के लिए टेस्ट नहीं देना होता है।
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इससे उन्हें छूट मिलती है। पर सैन्यकर्मियों को डीएल बनवाने के लिए आरटीओ आना पड़ता है, जहां अधिकारी उनके सैन्य डीएल की जांच करते हैं तथा आईडी सहित अन्य दस्तावेजों को जांचा जाता है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सैन्यकर्मियों को डीएल बनवाने के लिए अब ऑनलाइन ही आवेदन करना होगा, जहां उन्हें अफसरों से अप्रवूल की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। सूत्र बताते हैं कि इससे फर्जीवाड़े की आशंका बढ़ेगी। चूंकि मामला सेना से जुड़ा है, इसलिए सुरक्षा व एहतियात बरतना अधिक जरूरी है।
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इसलिए बढ़ी धोखाधड़ी की आशंका
सूत्र बताते हैं कि दो अलग-अलग साॅफ्टवेयरों को जोड़ने के लिए एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस एपीआई का इस्तेमाल होता है। सेना की ओर से सैन्यकर्मियों को जारी किए जाने वाले डीएल उनके साॅफ्टवेयर पर रहते हैं, जबकि परिवहन विभाग के डीएल सारथी पोर्टल पर होते हैं। दोनों साॅफ्टवेयर आपस में लिंक नहीं हैं। ऐसे में सैन्यकर्मी जब आरटीओ में ऑनलाइन डीएल के लिए अप्लाई करेंगे तो उनके पुराने विवरणों की जांच तक नहीं हो पाएगी, जिससे फर्जीवाड़ा बढ़ने की आशंका है।