उत्तर प्रदेश से अलग होकर खुशहाली का सपना देखने वाले उत्तराखंड के पहाड़ आज भी कड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे हैं। दावों और वादों की चकाचौंध के बीच हकीकत यह है कि दुर्गम क्षेत्रों में गर्भवती महिलाएं हों या बीमारी की चपेट में आया कोई व्यक्ति, उसे नजदीकी अस्पताल से पर्याप्त सुविधाओं वाले जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने में दो दिन से भी अधिक समय लग जाता है।
Uttarakhand: पहाड़ सी बेबसी झेल रही सेहत, अस्पताल की दूरी कई दिनों में हो रही पूरी, दावों की ये है हकीकत
पहाड़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति चिंताजनक है। अस्पताल की दूरी कई दिनों में पूरीहो रही है। दावों और वादों की चकाचौंध के बीच हकीकत कुछ और ही है।
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बीमारी से ज्यादा अस्पताल तक पहुंचने का दर्द
पौड़ी जिले के थलीसैंण ब्लॉक के कुछ गांव ऐसे हैं जहां से अस्पताल तक पहुंचना किसी चुनौती को पार करने जैसा है। यहां के स्यूंसाल गांव के लोग स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं। ग्रामीण कलावती और सीमा रावत कहती हैं कि गांव से अस्पताल तक पहुंचना किसी बड़े लक्ष्य को हासिल करने जैसा है। सबसे अधिक परेशानी तब आती है जब किसी गर्भवती की तबीयत बिगड़ती है या उसके प्रसव की तारीख आ जाती है। गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड के लिए भी 100 किलोमीटर से अधिक दौड़ लगानी पड़ती है। पौड़ी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शिव मोहन शुक्ला का कहना है कि जिला अस्पताल के साथ ही सीएचसी पीएचसी में संसाधन बढ़ाने के लिए काम किया जा रहा है। पहाड़ों से रेफरल कैसे रुके इस दिशा में रणनीति तैयार की जा रही है।
अस्थाई राजधानी गैरसैंण के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को उपजिला चिकित्सालय तो घोषित कर दिया गया लेकिन व्यवस्थाएं नहीं जुट पाईं हैं। सारकोट की ग्राम प्रधान प्रियंका नेगी ने कहा कि उनके गांव में 300 से अधिक परिवार रहते हैं। क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या अधूरी स्वास्थ्य सुविधाएं है। गांव की महिलाओं को प्रसव के दौरान खासी दिक्कतें आती हैं। कई मामले ऐसे भी हुए कि अस्पताल पहुंचने में देरी होने पर रास्ते में ही प्रसव हो गया। उपजिला चिकित्सालय में ऑपरेशन थिएटर और एनेस्थेटिक डॉक्टर न होने से गर्भवतियों को रेफर कर दिया जाता है। इस पर ग्रामीण सरिता देवी, खिमुली देवी और बैशा देवी कहती हैं कि पिछले एक वर्ष में दो गर्भवती महिलाओं की मौत भी हो चुकी है। अस्पताल तक पहुंचने में दो से तीन दिन लग जाते हैं, ऐसे में कई बार हालत बिगड़ जाती है। उधर रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि के चाका गांव की भी यही स्थिति है। नदी के पार बसे चाका की ग्राम प्रधान वंदना और ग्रामीण चंद्रमा देवी, पुष्पा देवी, बीना देवी ने भी अपनी पीड़ा बयां की। कहा कि मोटर मार्ग कच्चा है, मुख्य मार्ग तक जाने के लिए ट्रॉली लगाई गई है। चार बजे के बाद ट्रॉली बंद हो जाती है। अगर रात के समय किसी की तबीयत खराब होती है तो अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो जाता है।
चार बजे के बाद बीमार हुए तो अस्पताल पहुंचना नामुमकिन
पौड़ी शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क से सात किलोमीटर नीचे बसे सुराल गांव में बाघ की आवाजाही से दहशत है। गांव निवासी भुवनेश्वरी देवी, दामंती देवी, रीना और जयपाल नेगी बताते हैं कि चार बजे के बाद झाड़ियों में छिपे बाघ बाहर आ जाते हैं। घरों के आसपास घूमने के साथ ही सड़कों पर डेरा जमा लेते हैं। अगर किसी की अचानक तबीयत बिगड़ जाए तो अस्पताल पहुंचना नामुमकिन हो जाता है। चाहे जिएं या मरें अगली सुबह का ही इंतजार करना पड़ता है।
डॉक्टर से ज्यादा देवताओं पर भरोसा
उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों के दूरस्थ गांवों में हैरान कर देने वाली एक बात सामने आई। महिलाओं ने बताया कि जब अस्पताल पहुंचना जटिल होता है तो देवता ही उनके लिए डॉक्टर होते हैं। बीमार होने पर कई दिनों तक इलाज नहीं मिल पाता है। गांव के कुछ लोग घर पर ही प्रसव करवाने को प्राथमिकता देते हैं। उनको लगता है कि घर पर देवताओं का वास होता है। ऐसे में घर पर प्रसव काफी शुभ होता है। विपरीत परिस्थितियों की वजह से कई बार यह आस्था मजबूरी का भी रूप ले लेती है।
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गैरसैंण में उपजिला चिकित्सालय बनाया गया है। अल्ट्रासाउंड के लिए महीने में एक बार रेडियोलॉजिस्ट बुलाया जाता है। ओटी बनाने और निश्चेतक की तैनाती के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। लोगों से भी अपील है कि समय से अस्पताल पहुंचें ताकि उन्हें रेफर कर जल्दी हायर सेंटर भेजा जा सके। -डॉ. अभिषेक गुप्ता, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, चमोली