पंजाब के दो गबरू कलाकार दिलजीत दोसांझ और गिप्पी ग्रेवाल एक साथ एक रेस में उतर आए हैं। इस रेस में उनकी कोई जीत या हार नहीं होगी क्योंकि दोनों की यह रेस अलग-अलग दिशाओं में है। दिलजीत दोसांझ ने हाल ही में 1984 में हुए सिख दंगों पर एक हिंदी फिल्म बनाने का एलान किया है। अब इसी मुद्दे पर गिप्पी ग्रेवाल ने भी एक फिल्म बनाने की घोषणा कर दी है। हालांकि गिप्पी की यह फिल्म पंजाबी भाषा में होगी। इस मुद्दे पर फिल्में इसके पहले भी खूब बन चुकी हैं।
फिर आई 31 अक्तूबर, फिर उठा मुद्दा ‘विडो कॉलोनी’ का, अब तक इतना घूम चुका सिख दंगों पर ये फिल्मी कैमरा
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विडो कॉलोनी
गिप्पी ग्रेवाल की घोषित फिल्म का शीर्षक 'विडो कॉलोनी' है। यह कहानी उन औरतों की होगी जो उन दंगों में विधवा हो गईं। उन्हें अपने घरों को छोड़कर जाना पड़ा और नई दिल्ली के तिलक विहार स्थित एक कॉलोनी में शरण लेनी पड़ी। इस कॉलोनी को विडो कॉलोनी के नाम से ही जाना जाता है। इस फिल्म का निर्देशन समीप कंग (Smeep Kang) करेंगे और इसकी शूटिंग अगले साल से शुरू होगी। आइए आगे की स्लाइड्स में आपको बताते हैं इसी मुद्दे पर बन चुकी कुछ और फिल्मों के बारे में।
31 अक्तूबर (2016)
चार साल पहले शिवाजी लोटन पाटिल ने एक हिंदी फिल्म '31 अक्तूबर' का निर्देशन किया जिसकी कहानी वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से शुरू होती है। फिल्म की पूरी कहानी एक परिवार पर केंद्रित है जो इस नरसंहार में अपने बचाव के तरीके ढूंढता है। फिल्म में सोहा अली खान, वीर दास, लक्खा लखविंदर सिंह और प्रीतम कांगने ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं।
47 टू 84 और कौम दे हीरे (2014)
सिख दंगों को ही ध्यान में रखकर दो पंजाबी फिल्मों की रचना की गई जिसमें एक फिल्म रही '47 टू 84' और दूसरी 'कौम दे हीरे'। इन दोनों ही फिल्मों की कहानी अलग-अलग रहीं। '47 टू 84' की कहानी एक बच्चे की है जो वर्ष 1947 में हुए देश के बंटवारे के दौरान तो बच जाता है। उसकी जिंदगी ठीक-ठाक चलने लगती है लेकिन फिर अचानक 1984 के दंगों में वह अपने प्राण त्याग देता है। वही 'कौम दे हीरे' फिल्म को उन तीन लोग सतवंत सिंह, बेअंत सिंह और केहर सिंह के जीवन पर बनाया गया है जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की थी। यही हत्या वर्ष 1984 के दंगों का कारण बनी।
अमु (2005)
साल 2005 में शोनाली बोस ने एक फिल्म का निर्देशन किया जिसका शीर्षक 'अमु' है। इस फिल्म का सीधा नाता 1984 के दंगों से नहीं था। यह एक लड़की कजोरी रॉय की कहानी है जो अमेरिका से भारत अपनी जन्मभूमि को देखने आती है। यहीं आकर उसे पता चलता है कि वर्ष 1984 में हुए दंगों में उसके पिता और उसके भाई को मार दिया गया था। जबकि उसकी मां ने खुद फांसी लगा ली थी। यह फिल्म हिंदी, पंजाबी, बंगाली और अंग्रेजी चार भाषाओं में रिलीज की गई। कोंकणा सेन शर्मा, बृंदा करात, अंकुर खन्ना आदि कलाकार फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में रहे।