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कानपुर एनकाउंटर: सबसे बड़ा सवाल, अगर विकास दुबे जिंदा रहता तो क्या होता...?
आशीष अग्रवाल, अमर उजाला, कानपुर
Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Sat, 11 Jul 2020 04:35 PM IST
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kanpur encounter
- फोटो : amar ujala
विकास का एनकाउंटर जहां पुलिसकर्मियों को कठघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं शहीदों के परिजन और पीड़ित खुशी मना रहे हैं। इन सबके बीच एक चर्चा भी आम है कि अगर पांच लाख का इनामी, आठ पुलिसकर्मियों की मौत का जिम्मेदार यूपी का दुर्दांत अपराधी विकास दुबे जिंदा होता तो क्या होता।
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Kanpur encounter
- फोटो : अमर उजाला
अदालत में पेशी, रिमांड की कवायद, बरामदगी का झमेला, फिर चार्जशीट दाखिल करने के बाद अदालत में गवाहों के बयान, जिरह और फैसले तक में सालों का सफर तय करना पड़ता। इसके बाद भी शहीद पुलिसकर्मियों को इंसाफ मिलता या दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला हत्याकांड की तरह कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाकर विकास फिर बाइज्जत बरी हो जाता। यह कहना मुश्किल था।
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kanpur encounter news
- फोटो : amar ujala
बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सुरेश सिंह चौहान ने बताया कि पुलिस को उज्जैन से विकास को लाकर कानपुर देहात कोर्ट में पेश करना पड़ता। इसके बाद कोर्ट उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज देती। कोर्ट से आदेश लेकर विवेचक विकास के बयान दर्ज करने जेल जाता फिर हथियारों की बरामदगी व पूछताछ की बात कहकर कोर्ट से पुलिस कस्टडी रिमांड मांगनी पड़ती। रिमांड मिलने की स्थिति में कोर्ट शर्तें भी लगा सकती थी।
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जैसे रिमांड अवधि के दौरान विकास का वकील उसके साथ रहेगा, पूरी वीडियोग्राफी होगी, जेल से निकालने और फिर जेल दाखिले से पहले विकास का मेडिकल होगा, उस पर किसी प्रकार की थर्ड डिग्री का इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन विकास का एनकाउंटर करके पुलिस इन सभी झंझटों से बच गई। वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता कमलेश पाठक का कहना है कि विकास के एनकाउंटर से भले ही यूपी पुलिस अपनी साख बचाने में खुद को सफल मान रही हो लेकिन बिकरू कांड में सिर्फ विकास ही आरोपी नहीं है उसके अलावा भी कई आरोपी हैं।
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पुलिस के सामने अभी उन्हें पकड़ने की चुनौती होगी। असलहों की बरामदगी के साथ घटना से संबंधित सबूत भी इकट्ठा करने होंगे। इसके बाद अदालत में गवाही, जिरह के बाद न्यायाधीश इंसाफ करेंगे। संतोष शुक्ला कांड में पुलिसकर्मियों ने ही गवाही देने में कोताही की थी, जिससे विकास के हौसले बुलंद हुए और दोबारा इतनी बड़ी घटना हो गई। इस बार पुलिस को पुरानी घटना से सबक लेकर पूरी तैयारी के साथ न्यायिक कार्यवाही का सामना करना होगा। न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टि से देखें तो विकास जिंदा होता तब भी पुलिस को इस मुकदमे में लगभग उतनी ही कवायद करनी पड़ती जितनी उसकी मौत के बाद करनी होगी।
