युद्धग्रस्त यूक्रेन में फंसी ताजनगरी की छात्रा अंजलि, भाव्या और जया भी मंगलवार को घर पहुंच गईं। बिटियां घर आईं तो आंगन में खुशियां छा गईं। माता-पिता के अलावा रिश्तेदार व पड़ोसी जुट गए। फूल मालाओं से बेटियों का स्वागत हुआ। अब तक ताजनगरी के सभी 74 छात्र-छात्राएं घर लौट आए हैं। 10 दिनों से तीनों बेटियां खारकीव में फंसी थीं। तमाम मुश्किल हालात से जूझते हुए उन्होंने घर वापसी का सफर तय किया है।
{"_id":"62276a069c7cd06d041b464d","slug":"agra-three-medical-students-returns-from-kharkiv-city-of-ukrain","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"यूक्रेन: बम धमाके में गई थी कर्नाटक के छात्र की जान, खारकीव से लौटी आगरा की छात्रा ने बताया भयावह मंजर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूक्रेन: बम धमाके में गई थी कर्नाटक के छात्र की जान, खारकीव से लौटी आगरा की छात्रा ने बताया भयावह मंजर
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Tue, 08 Mar 2022 08:19 PM IST
विज्ञापन
आगरा की छात्रा का जूनियर था कर्नाटक का छात्र
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भव्या पिता डीएस चौहान व मां मीना चौहान के साथ
- फोटो : अमर उजाला
एक रात मेट्रो में, सात दिन बंकर में गुजारे
शमसबाद रोड निवासी भाव्या चौहान ने बताया कि वह पांच साल से खारकीव में रह कर एमबीबीएस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि 24 फरवरी से हमले शुरू हो गए थे। पहले दिन हम मेट्रो स्टेशन पर सोए। फिर हमें पता चला कि बिल्डिंग में बंकर हैं। सात दिन हम वहां रहे। बंकर में खाना-पीना खत्म हो गया था। 24 घंटे में एक बार खाकर गुजारा किया। फिर एक मार्च को वहां धमाका हुआ। जिसमें एक भारतीय छात्र मारा गया। वह मेरा जूनियर था। उस दिन भी वहां से निकल नहीं सके।
छात्रा भाव्या चौहान
- फोटो : अमर उजाला
भाव्या चौहान ने बताया कि किसी तरह खारकीव से निकले तो ट्रेन में धक्का-मुक्की व अभद्रता हुई। फिर वहां से मजबूर होकर हम पिसाचिन तक पैदल गए। वहां एबेंसी की तरफ से व्यवस्था की गई थी। वहां से टर्नोपिल होते हुए रोमानिया आए। जहां से भारत सरकार की मदद से घर वापस लौट पाए हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
आगरा का छात्रा अंजलि पचौरी
- फोटो : अमर उजाला
एक बार लगा कि कभी वापस नहीं लौट पाएंगे
शास्त्रीपुरम निवासी अंजलि पचौरी ने बताया कि वह खारकीव में एमबीबीएस प्रथम वर्ष की छात्रा हैं। उन्होंने कहा कि दो दिन हमें ट्रेन में जगह नहीं मिली। तब ऐसा लगा था कि शायद अब कभी घर वापस नहीं लौट पाएंगे। शहर में धमाके हो रहे थे। मिसाइल हमले व गोलीबारी की आवाजें आ रही थीं।
विज्ञापन
अंजली पचौरी का स्वागत करते मोहल्ले की महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
अंजलि ने कहा कि सात दिन तक बंकर में रहना पड़ा। खाना-पीना खत्म हो गया था। खारकीव से निकल नहीं पा रहे थे। फिर करीब 20 किमी. पैदल चलकर पिसाचिन में बने शेल्टर होम पहुंचे। वहां से बस ने रोमानिया तक ले जाने के लिए 500 डॉलर मांगे, हमारे पास नकदी नहीं थी। दो दिन भूखे प्यासे रहे। फिर भारत सरकार ने बस की व्यवस्था कराई। जिसके बाद हम वहां से निकल सके।