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लक्ष्मण जी ने कुएं से देवी मूर्ति निकाल रखी थी बरगद के पेड़ के नीचे, जाने कुशहरी देवी की कहानी
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Wed, 21 Mar 2018 08:03 AM IST
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कुशहरी देवी
उन्नाव के नवाबगंज में कुषाण काल मेें स्थापित मां दुर्गा-कुशहरी देवी की महिमा जिले में ही नहीं प्रदेश स्तर तक फैली हुई है। मां के दरबार में हर नवरात्र पर लाखों की संख्या में माता के भक्त दर्शन लाभ को पहुंचते हैं। नवरात्र पर्व पर सुबह से लेकर शाम तक दुर्गा-कुशहरी देवी के दर्शन के लिए भक्तों की कतारें लग रही हैं।
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कुशहरी देवी
नवाबगंज कस्बे से लगभग चार किमी दूर कुसुंभी गांव में माता कुशहरी देवी का प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि यह मंदिर देश में वर्णित शक्तिपीठों मेें से एक है। मान्यताओं के आधार पर जब श्रीराम ने सीता का परित्याग किया और अपने भाई लक्ष्मण को आदेश दिया कि सीता को गंगातट के जंगलों में छोड़ आओ। भाई का आदेश मिलते ही लक्ष्मण सीता को रथ में बैठाकर निकल पड़े।
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कुशहरी देवी
मार्ग में माता सीता को प्यास लगी तो उन्होंने लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा। पात्र लेकर जैसे ही एक कुएं से जल लेने का प्रयास किया तो कुएं से एक आवाज आई कि पहले मुझे बाहर निकालो फिर यहां से जल भरो। लक्ष्मण ने वैसा ही किया तो कुंए से एक देवी मूर्ति निकली। उस मूर्ति को उन्होंने कुएं के पास एक बरगद के पेड़ के नीचे रख दिया और जल लेकर सीता के पास पहुंचे।
कुशहरी देवी
उन्होेंने इस बारे मे सीता को सब कुछ बता दिया। गंगातट पर रथ रोक नाव से बिठूर के पास जंगल मेें पहुंचे। यहां आने के बाद सीता को बताया कि श्रीराम ने उन्हें त्याग दिया है। कहा कि यहां बाल्मीकि ऋषि का आश्रम है। वह हमारे पिता दशरथ के गुरू हैं। सीता जी यह सुनकर बहुत दुखी हुईं और कहा अपने भाई से जाकर कहना कि मैं गर्भवती हूूं। यह सुनकर लक्ष्मण व्यथित हो गए।
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कुशहरी देवी
इसके बाद लक्ष्मण वापस अयोध्या चले गए। तपोवन में सीता का विलाप सुनकर बाल्मीकि आए और सीता को अपने साथ लेकर आश्रम चले गए। वहां उन्हें ऋषि मुनियों की पत्नियों के साथ उन्हें रहने का स्थान दिया। समय आने पर सीता को लव और कुश नामक दो पुत्र हुए। दोनों बालक महान पराक्रमी, धनुर्धर व रणकौशल में निपुण हुए। काफी दिनों बाद नैमिषारण्य धाम में श्रीराम ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया।
