मेरठ में एनसीईआरटी की नकली किताबों को छापने के खेल में पुलिस, एनसीईआरटी अभी तक उस किताब विक्रेता पर खामोश हैं, जिसके माध्यम से नकली किताब छात्र तक पहुंची। आखिर वो किताब विक्रेता कौन है, जो संजीव गुप्ता से नकली किताब खरीदकर बाजार में बेचने का कारोबार करता है। नकली किताबों को छापने के साथ नकली किताबें बेचने वालों पर भी शिकंजा कसने की मांग उठ रही है।
मेरठ: अब उठ रहा ये बड़ा सवाल, आखिर एनसीईआरटी की फर्जी किताबें बेचने वाला कौन?
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पुस्तक विक्रेताओं के अनुसार जो किताब विक्रेता नकली किताबों को बेचते हैं वो भी अपराधी हैं। इस खेल में वो विक्रेता भी एक कड़ी हैं जिनके माध्यम से किताबें बच्चों, स्कूलों तक पहुंचती हैं। पुलिस उन विक्रेताओं पर शिकंजा क्यों नहीं कस रही। न ही एनसीईआरटी इस पर कोई कार्रवाई कर रहा है। आखिर ये नकली किताब कौन से स्टोर से खरीदी गईं या कहां से बेची गईं।
- सदर के चर्चित बुक डिपो का नाम शामिल
नकली किताबें बेचने के प्रकरण में सदर स्थित एक चर्चित बुक स्टोर का नाम सामने आ रहा है। यह पुस्तक विक्रेता बीस से अधिक वर्षों से स्कूलों की पुस्तकों के विक्रय का काम करता है। स्टोर से कैंट क्षेत्र के सभी स्कूलों की किताबें खरीदी जाती हैं। अधिकांश स्कूलों में इसी स्टोर से किताबें जाती हैं। माना जा रहा है कि इसी बुक स्टोर से यह नकली किताब खरीदी गई थी। जिसे अधिक लाभ पर बेचा गया है।
- नकली पर असली किताबों से दोगुना लाभ
एनसीईआरटी की असली किताबें बेचने पर विक्रेता को 15 प्रतिशत लाभ मिलता है। जबकि नकली किताबों में यह लाभ दोगुना तक हो जाता है। मोटा लाभ कमाने के लिए किताब विक्रेता ने असली के साथ नकली किताबें बेची हैं, या फिर नकली किताबें ही बेची जा रही हैं।
- नकली किताबों के खेल में स्कूलों की साझेदारी
एनसीईआरटी की नकली किताबों के कारोबार में कई स्कूल भी शामिल हैं। कई स्कूलों में अंदर अपने बुक स्टोर्स संचालित हैं। जहां से बच्चों को किताबें लेना अनिवार्य होता है। अन्यथा स्कूलों से किताबों के पर्चे के साथ बुकस्टोर का नाम भी दिया जाता है। पेंसिल, रबर, शॉर्पनर से लेकर बस्ता लेने के लिए ब्रांड और दुकान का नाम स्टेशनरी के पर्चे पर लिखकर दिया जाता है। अभिभावकों को मजबूरन उसी दुकान से किताबों का सेट लेना पड़ता है। अगर किसी दूसरी दुकान से किताब ले आए तो स्कूल उसे लगाने से इंकार कर देते हैं। स्कूलों की अपनी किताब की दुकानें तय हैं। ऐसे में साफ जाहिर है कि कमीशन में हिस्सेदारी लेते हुए नकली किताबों के खेल में स्कूल शामिल हैं।
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