मेरठ में पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग सहित सरकारी तंत्र की लापरवाही और शराब की लत ने एक बार फिर से कई परिवारों को उजाड़ दिया। शराब से लगातार मौतें होने के बावजूद जांच टीमें अपने बचाव में ही जुटी रहीं। वहीं, गांव में नौ लोगों की मौत के बाद हर तरफ हाहाकार मचा हुआ है। कई लोगों की जिंदगी अब तक खतरे में है। सवाल यही उठ रहा है कि इतने लोगों की जिंदगी को मौत बांटने का जिम्मेदार कौन है। पंचायत चुनाव में शराब बांटने वाले प्रत्याशी और समर्थक या फिर अवैध शराब के खेल को संरक्षण देने वाले पुलिस प्रशासन के अफसर।
शराब का कहर: रोते-बिलखते हुए बोले मासूम, पापा नहीं रहे, अब हमारा क्या होगा, उजड़ गए आठ परिवार, तस्वीरें
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गांव में इस घटना के बाद बच्चों से पिता का साया छीन गया तो कुछ परिवारों से रोजी रोटी की उम्मीद छिन गई। पीड़ित परिवारों को सांत्वना देने के लिए ग्रामीणों का तांता लगा रहा। नीरज के परिवार में चार और तीन साल के बेटों के अलावा एक साल की बेटी भी है। वहीं, कपिल की बड़ी बेटी तनिष्का चौथी कक्षा की छात्रा है। छोटी बेटी छवि कक्षा एक में पढ़ती है।
‘पापा नहीं रहे, अब हमारा क्या होगा’
कपिल की बेटी तनिष्का बिलखते हुए बोल रही थी-पापा नहीं रहे, अब हमारा क्या होगा। दीपक के तीन बच्चे हैं। इसमें आलोक, वंशिका और हैप्पी शामिल हैं। शराब के नशे ने चार महिलाओं का सुहाग छीन लिया। इनमें प्रीति पत्नी नीरज, मोनी पत्नी कपिल, सोना पत्नी बिजेंद्र और रूबी पत्नी दीपक शामिल हैं।
पुलिस के दबाव में रहे पीड़ित परिवार
बताया जा रहा है कि पुलिस के दबाव में सोमवार शाम तक कुछ परिजनों ने बिना पोस्टमार्टम ही शवों का संस्कार करा दिया। हालांकि एक परिवार ने चुनाव में बंटी शराब पीने से हालत बिगड़ने की बात का जिक्र किया। तमाम दावों के बावजूद पुलिस और आबकारी विभाग की टीमें अवैध शराब बांटने पर लगाम नहीं लगा पाईं। इससे पहले मीरपुर जखेड़ा और महल गांव में ऐसी घटनाएं हुईं, लेकिन ‘बिसरा जांच’ की आड़ में मामले दबा दिए गए।
इन मौतों से आज तक नहीं उठा पर्दा
केस - 1
जानी ब्लॉक के मीरपुर जखेड़ा में गत वर्ष इसी तरह 9 सितंबर को शराब पीने से तीन लोगों की मौत हुई। इस मामले में भी पुलिस और आबकारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहर की पुष्टि न होने का हवाला देकर खुद को क्लीन चिट दी। बिसरा जांच के लिए भेजा। लेकिन रिपोर्ट का अता पता नहीं।