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UP: हाथ नहीं हैं, पैरों से सपने बुन रही मंजू, आठ साल पहले हादसे ने छीन लिए थे हाथ; फिल्म की पटकथा जैसी कहानी

अमर उजाला नेटवर्क, संभल Published by: Sharukh Khan Updated Thu, 18 Jun 2026 03:50 PM IST
सार

हाथ नहीं हैं, बहादुर बेटी मंजू पैरों से सपने बुन रही है। आठ साल पहले एक हादसे ने मंजू के हाथ छीन लिए थे। संभल के एमजीएम कॉलेज से बीए दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं मंजू की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है।

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संभल की मंजू बनी दूसरों के लिए मिसाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

संभल शहर से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर बसे गांव चिमियावली की बहादुर बेटी मंजू को आत्मनिर्भर बनने की ललक ने इतना आगे बढ़ा दिया है कि वह अब मुड़कर पीछे देखना ही नहीं चाहती। वह अपने भविष्य को संवारना चाहती है। उसके हाथ नहीं हैं और वह पैरों से अपने सपने बुन रही है। पैरों से कंप्यूटर चला लेती है। कपड़े प्रेस करती है। कपड़े भी सिलती है। उसका कहना है कि उसने कड़े संघर्ष के बाद खुद को अब तैयार कर लिया है। वह बीए कर रही है और पैरों से ही लिखती है। 



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मशीन में धागा लगाती मंजू - फोटो : संवाद

संभल के एमजीएम कॉलेज से बीए दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं मंजू की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। लेकिन उसकी कहानी हकीकत है। ऐसी हकीकत जिसमें दर्द की तस्वीर आज भी मंजू के साथ उनकी मां सोमवती के चेहरे से साफ छलकती है।

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पांव से प्रेस करती हुई - फोटो : संवाद

सोमवती का गला बेटी का संघर्ष बताते-बताते भर आया। मंजू के पिता कल्लू ने बेटी के हौसले को हमेशा उड़ान देने का काम किया है। वह हादसे के बाद से ही बेटी को पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे और अब वह कहते हैं कि जितना पढ़ना है पढ़ लो बेटा। मंजू की पढ़ाई में कोई दिक्कत न आए। इसका ख्याल मां, पिता के साथ बड़ा भाई अर्जुन और छोटा भाई कपिल भी रखता है।

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पांव से कैंची चलाकर कपड़े को काटती छात्रा - फोटो : संवाद

मंजू अपने तीन भाई और तीन बहनों में तीसरे नंबर की हैं। सबसे बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और अब परिवार में तीन भाई और दो बहन हैं। खेती की जमीन तो कम है इसलिए मंजू के पिता और भाई मेहनत मजदूरी कर परिवार की गुजर-बसर करते हैं।

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पांव से लिखकर परीक्षा देतीं मंजू - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

बहुत रोती थी और भगवान से शिकायत करती थी, तब दादा बढ़ाते थे मेरा हौसला
मंजू ने बताया कि करीब आठ वर्ष पहले हादसे में हाथ गए तो लगा अब पढ़ना तो दूर की बात है जीना भी मुश्किल हो जाएगा। वह बहुत रोती और भगवान से शिकायत करती थीं। मंजू के दादा रामचंद्र कहते थे कि बेटा पढ़ने के लिए हिम्मत चाहिए और इस हिम्मत को कम मत होने दो। यही उसकी प्रेरणा बन गई।

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