संभल शहर से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर बसे गांव चिमियावली की बहादुर बेटी मंजू को आत्मनिर्भर बनने की ललक ने इतना आगे बढ़ा दिया है कि वह अब मुड़कर पीछे देखना ही नहीं चाहती। वह अपने भविष्य को संवारना चाहती है। उसके हाथ नहीं हैं और वह पैरों से अपने सपने बुन रही है। पैरों से कंप्यूटर चला लेती है। कपड़े प्रेस करती है। कपड़े भी सिलती है। उसका कहना है कि उसने कड़े संघर्ष के बाद खुद को अब तैयार कर लिया है। वह बीए कर रही है और पैरों से ही लिखती है।
UP: हाथ नहीं हैं, पैरों से सपने बुन रही मंजू, आठ साल पहले हादसे ने छीन लिए थे हाथ; फिल्म की पटकथा जैसी कहानी
अमर उजाला नेटवर्क, संभल
Published by: Sharukh Khan
Updated Thu, 18 Jun 2026 03:50 PM IST
सार
हाथ नहीं हैं, बहादुर बेटी मंजू पैरों से सपने बुन रही है। आठ साल पहले एक हादसे ने मंजू के हाथ छीन लिए थे। संभल के एमजीएम कॉलेज से बीए दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं मंजू की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है।
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