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दिव्यांगों के हौसले को सलाम: बड़ी मुसीबतों का सामना कर बन गए मिसाल, संघर्ष भरी है हर किसी की कहानी

Fri, 03 Dec 2021 05:50 PM IST
कपिल kapil अमर उजाला ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
अमर उजाला ब्यूरो, मुजफ्फरनगर Published by: कपिल kapil Updated Fri, 03 Dec 2021 05:50 PM IST
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Handicapped Day 2021: Read the story of the struggle of the Divyangs of Muzaffarnagar city
दिव्यांग। - फोटो : amar ujala

मुजफ्फरनगर जनपद के दिव्यांगों ने अपने हौसलों से समाज के लिए प्रेरणा की नई कहानी लिखी है। गांव की गलियों से लेकर ओलंपिक तक में दिव्यांगों का दमखम देखने को मिला है। भोपा के सगे भाई जीवटता की मिसाल बन गए हैं। मेहनत के दम पर आज वह किसी के मोहताज नहीं रहे। कुदरत ने पैर छीने, लेकिन दिव्यांगों ने कुछ कर दिखाने के जज्बे के साथ नई मिसाल पेश कर दी। सिर्फ खेती में ही नहीं, बल्कि मजदूरी, व्यापार और खेल के आसमान पर ऐसे सितारे चमक रहे हैं।



देश की रोशनी बन गई गोयला की ज्योति
शाहपुर क्षेत्र के गांव गोयला की पैरा तीरंदाजी खिलाड़ी ज्योति बालियान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमक बिखेरी है। राष्ट्रीय स्तर पर 18 स्वर्ण पदक जीतने के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीन पदक हासिल किए है। वर्ल्ड चैंपियनशिप, एशियन चैंपियनशिप और पैरालंपिक में ज्योति की चमक दुनिया ने देखी है। ज्योति रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार हासिल कर चुकी है।

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राजबल सिंह - फोटो : amar ujala

जैवलिंग थ्रो में स्वर्ण पदक जीत चुकें राजबल
दिव्यांगता को मात देने का मूलमंत्र है मेहनत। पांच साल की उम्र में मशीन में एक हाथ गंवाने वाले अलीपुरा गांव के राजबल सिंह के लक्ष्य और कठिन मेहनत के सामने असफलता बौनी नजर आती है। पसीना बहाकर वह अंतराष्ट्रीय स्तर पर जैवलिंग थ्रो, डिस्कस और शार्टपुट थ्रो में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। वर्ष 2024 में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए वह रेस्टोरेंट के पेशे के साथ प्रैक्टिस में जुटे हैं। 

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राजबल सिंह - फोटो : amar ujala

मेरठ निवासी पत्नी बुलबुल भी पैर से दिव्यांग होने के बावजूद नेशनल खेल चुकी है। किसान ब्रजपाल सिंह के बेटे का पांच साल की उम्र में घास काटने की मशीन में आकर हाथ कट गया। बेटे के दिव्यांग होने के बावजूद पिता ने हार नहीं मानी। राजबल ने एमए तक पढ़ाई की और खेल में खुद का तराशा। उन्होंने डिस्कस थ्रो, जैवलिंग और गोला फेंक में विदेशों में धाक जमाई। फिलीपींस, मलेशिया और जापान में गोल्ड मेडल जीता। कहते है दिव्यांगता के लिए खेल बड़ी प्रेरणा है।

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दिव्यांग किसान अमोद कुमार - फोटो : amar ujala

दिव्यांग अमोद से सीखिए खेती करना
भोपा थाना क्षेत्र की सीमा से सटे गांव बसेड़ा निवासी दिव्यांग किसान अमोद कुमार (38) एक वर्ष की उम्र में ही पोलियो से ग्रस्त हो गए थे, जिसके कारण उनके दोनों पैर निष्क्रिय हो गए। इसके बाद भी प्रमोद कुमार खेती-बाड़ी के कार्य में किसी भी किसान से कमतर नहीं है। अमोद कुमार के भाई प्रवीण कुमार व चचेरे भाई विकास चेयरमैन बताते हैं कि अमोद कुमार आज भी कड़ी मेहनत के दम पर अपने सभी कार्य खुद करते हैं। खेती का काम करने में वह माहिर है। अमोद कुमार एक खेत से दूसरे खेत तक जाने के लिए भैंसे की पीठ पर सवार होकर पहुंचते हैं।

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मोनू कुमार। - फोटो : amar ujala

कुदरत ने दिव्यांग बनाए, हौसले से बन गए मिसाल
भोपा कस्बा निवासी मंगता पाल के बेटे विकास व मोनू दिव्यांग होने के बाद भी घर से लेकर खेत तक अपने सारे कार्य खुद करते हैं। दोनों भाई भैंसा-बोगी से भाड़े का कार्य करते हैं। दोनों ने मिलकर एक ई-रिक्शा भी किस्तों पर खरीदी, जिससे वह भोपा से आसपास क्षेत्र में चलाकर गुजारा करते रहे। विकास ने कक्षा 10वीं तक तो मोनू ने 12वीं तक कक्षा पढ़ाई की हैं। दोनों भाई बताते हैं कि वे जी जान से अपना मजदूरी कार्य करते हैं। इनकी दो सगी बहने रजनी व मोनी भी दिव्यांग है। मोनी ने ग्रेजुएशन किया है और रजनी भी शिक्षित है। दोनों बहनें घर पर सिलाई करती हैं।

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