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गजब का हाल: वर्कशॉप में खड़ी बसें, सड़क पर यात्रियों की भीड़! रोडवेज को हर महीने लाखों का नुकसान
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 25 Mar 2026 11:39 AM IST
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सार
मेंटेनेंस में देरी के कारण कई बसें वर्कशॉप में खड़ी हैं, जिससे यात्रियों को परेशानी और रोडवेज को भारी नुकसान हो रहा है। चल न रही बसों पर भी हर महीने टैक्स और खर्च बढ़ने से विभाग की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
रोडवेज की बसें
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
रोडवेज की बसें इन दिनों मेंटेनेंस व्यवस्था की सुस्ती और संचालन न होने से खुद ही विभाग के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही हैं। एक ओर यात्रियों को बसों में सीट तक नहीं मिल रही, वहीं दूसरी ओर कई बसें महीनों से वर्कशॉप में खड़ी होकर राजस्व का नुकसान करा रही हैं। मेंटेनेंस के नाम पर खड़ी बसों को लेकर यह भी चर्चा है कि बस चालक और परिचालक नई बसों को लेकर जाना अधिक पसंद कर रहे हैं, जबकि पुरानी बसों में लगातार तकनीकी खामियां आने के कारण उन्हें वर्कशॉप में खड़ा कर दिया जाता है। पुरानी बसों में इंजन, ब्रेक, गियर, एयर बॉक्स जैसी समस्याएं आम हो गई हैं, जिससे उनका संचालन प्रभावित हो रहा है। इन बसों का रोडवेज को हर महीने हजारों रुपये टैक्स भरना पड़ रहा है।
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40 हजार किलोमीटर का संचालन पूरी कर चुकी हैं 50 बसें
आगरा फोर्ट, ईदगाह, फाउंड्री नगर, मथुरा डिपो में इस समय करीब 20 से 25 बसें लंबे समय से खड़ी हैं, जबकि लगभग 50 बसें ऐसी हैं जो 40 हजार किलोमीटर का संचालन पूरा कर चुकी हैं और मेंटेनेंस का इंतजार कर रही हैं। रोजाना करीब 6 बसें वर्कशॉप में पहुंचती हैं, लेकिन मरम्मत की धीमी गति के चलते बसों का बैकलॉग बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ रहा है। सड़क पर बसों की संख्या कम होने से भीड़ बढ़ रही है और यात्रियों को खड़े होकर सफर करना पड़ रहा है। मेंटेनेंस प्रक्रिया के तहत सामान्य चेकअप, 40 हजार किलोमीटर के बाद विस्तृत सर्विसिंग और विशेष तकनीकी खराबियों की मरम्मत की जाती है, लेकिन बड़े पार्ट्स जैसे इंजन आदि की मरम्मत में समय लगने के कारण बसें लंबे समय तक वर्कशॉप में खड़ी रहती हैं।
आगरा फोर्ट, ईदगाह, फाउंड्री नगर, मथुरा डिपो में इस समय करीब 20 से 25 बसें लंबे समय से खड़ी हैं, जबकि लगभग 50 बसें ऐसी हैं जो 40 हजार किलोमीटर का संचालन पूरा कर चुकी हैं और मेंटेनेंस का इंतजार कर रही हैं। रोजाना करीब 6 बसें वर्कशॉप में पहुंचती हैं, लेकिन मरम्मत की धीमी गति के चलते बसों का बैकलॉग बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ रहा है। सड़क पर बसों की संख्या कम होने से भीड़ बढ़ रही है और यात्रियों को खड़े होकर सफर करना पड़ रहा है। मेंटेनेंस प्रक्रिया के तहत सामान्य चेकअप, 40 हजार किलोमीटर के बाद विस्तृत सर्विसिंग और विशेष तकनीकी खराबियों की मरम्मत की जाती है, लेकिन बड़े पार्ट्स जैसे इंजन आदि की मरम्मत में समय लगने के कारण बसें लंबे समय तक वर्कशॉप में खड़ी रहती हैं।
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150-600 रुपये प्रति माह देना पड़ रहा टैक्स
सबसे अहम बात यह है कि वर्कशॉप में खड़ी इन बसों को सरेंडर नहीं किया जा रहा, जिससे आरटीओ में सीट क्षमता के आधार पर टैक्स लगातार देना पड़ रहा है। नियम के अनुसार बसों पर टैक्स उनकी सीटों की संख्या और उम्र के हिसाब से लिया जाता है। नई बसों पर लगभग 600 रुपये सीट प्रति माह, 4 से 6 वर्ष पुरानी बसों पर 400 रुपये सीट प्रति माह और 6 वर्ष से अधिक पुरानी बसों पर 150 रुपये सीट प्रति माह टैक्स निर्धारित है। इस तरह एक बस पर हर महीने करीब 8 हजार से लेकर 30,600 रुपये तक का टैक्स जमा करना पड़ता है, चाहे वह बस चले या वर्कशॉप में खड़ी रहे।
सबसे अहम बात यह है कि वर्कशॉप में खड़ी इन बसों को सरेंडर नहीं किया जा रहा, जिससे आरटीओ में सीट क्षमता के आधार पर टैक्स लगातार देना पड़ रहा है। नियम के अनुसार बसों पर टैक्स उनकी सीटों की संख्या और उम्र के हिसाब से लिया जाता है। नई बसों पर लगभग 600 रुपये सीट प्रति माह, 4 से 6 वर्ष पुरानी बसों पर 400 रुपये सीट प्रति माह और 6 वर्ष से अधिक पुरानी बसों पर 150 रुपये सीट प्रति माह टैक्स निर्धारित है। इस तरह एक बस पर हर महीने करीब 8 हजार से लेकर 30,600 रुपये तक का टैक्स जमा करना पड़ता है, चाहे वह बस चले या वर्कशॉप में खड़ी रहे।
पांचों डिपो के लिए हर महीने 15 लाख रुपये का मेंटेनेंस बजट
वर्कशॉप में खड़ी बसों से जहां कोई आय नहीं हो रही, वहीं टैक्स और मेंटेनेंस का खर्च लगातार बढ़ रहा है। पांचों डिपो के लिए हर महीने लगभग 15 लाख रुपये का मेंटेनेंस बजट शासन से निर्धारित है। कुल मिलाकर, पुरानी बसों में बढ़ती तकनीकी खामियां, नई बसों को प्राथमिकता, मेंटेनेंस में देरी और आरटीओ टैक्स का बोझ ये सभी कारण मिलकर रोडवेज को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। क्षेत्रीय प्रबंधक रोडवेज बीपी अग्रवाल ने बताया कि लगभग 4, 5 प्रतिशत बसों का मेंटेनेंस और रिपेयर का काम तय शेड्यूल के अनुसार लगातार चलता रहता है, और यही वजह है कि बाकी बसें ठीक होने की स्थिति में चलती रहती हैं।
वर्कशॉप में खड़ी बसों से जहां कोई आय नहीं हो रही, वहीं टैक्स और मेंटेनेंस का खर्च लगातार बढ़ रहा है। पांचों डिपो के लिए हर महीने लगभग 15 लाख रुपये का मेंटेनेंस बजट शासन से निर्धारित है। कुल मिलाकर, पुरानी बसों में बढ़ती तकनीकी खामियां, नई बसों को प्राथमिकता, मेंटेनेंस में देरी और आरटीओ टैक्स का बोझ ये सभी कारण मिलकर रोडवेज को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं। क्षेत्रीय प्रबंधक रोडवेज बीपी अग्रवाल ने बताया कि लगभग 4, 5 प्रतिशत बसों का मेंटेनेंस और रिपेयर का काम तय शेड्यूल के अनुसार लगातार चलता रहता है, और यही वजह है कि बाकी बसें ठीक होने की स्थिति में चलती रहती हैं।