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लाभचंद मार्केट प्रकरण: प्रशासन के सामने नई मुसीबत, डीएम ने जिस भूमि को बताया सरकारी; उसके मूल दस्तावेज ही गायब
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Tue, 24 Mar 2026 08:24 AM IST
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सार
लाभचंद मार्केट की विवादित नजूल भूमि के मूल दस्तावेज कलेक्ट्रेट से गायब मिलने से प्रशासन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। रिकॉर्ड के अभाव में जमीन का सही क्षेत्रफल तय नहीं हो पा रहा, अब विशेषज्ञों की मदद से समाधान तलाशा जा रहा है।
लाभचंद मार्केट विवाद
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
आगरा के राजा मंडी स्थित बहुचर्चित लाभचंद मार्केट प्रकरण में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जिलाधिकारी अरविंद बंगारी ने सुप्रीम कोर्ट में जिस नजूल भूमि को सरकारी घोषित किया था, अब कलेक्ट्रेट के रिकॉर्ड रूम से उस बेशकीमती जमीन के मूल दस्तावेज ही गायब मिले हैं। स्थिति यह है कि पुख्ता रिकॉर्ड न होने के कारण विवादित भूमि का वास्तविक क्षेत्रफल तय नहीं हो पा रहा है।
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प्रशासन इस गुत्थी को सुलझाने के लिए राजस्व परिषद के विशेषज्ञों की शरण में है। मूल रिकॉर्ड न होने के कारण विशेषज्ञों ने भी फिलहाल मदद से हाथ खड़े कर दिए हैं। अब प्रशासन ने पट्टा निरस्त होने का हवाला देकर पूरी गेंद नगर निगम के पाले में डाल दी है। बता दें कि सड़क की पैमाइश होने के बाद भी अभी तक मौके से अतिक्रमण नहीं हटाया जा सका है। रिकॉर्ड मिलान के लिए पुराने मानचित्रों और 1923 की बंदोबस्त फाइलों को खंगाला गया, लेकिन स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
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यह है लाभचंद मार्केट का विवाद
लाभचंद मार्केट का यह विवाद करीब आठ दशक पुराना है, जो मुख्य रूप से नजूल भूमि के स्वामित्व और पट्टे की शर्तों के उल्लंघन से जुड़ा है। यह भूमि मूल रूप से सरकारी (नजूल) थी, जिसे 1940 और 1947 के दौरान विशेष शर्तों के साथ धर्मचंद जैन को पट्टे पर दिया गया था। आरोप है कि पट्टे की शर्तों के विरुद्ध यहाँ अवैध व्यावसायिक निर्माण किया गया और दुकानों को किराए पर उठा दिया गया। शर्तों के उल्लंघन पर अप्रैल 2025 में नगर निगम ने पट्टा निरस्त कर दिया था। प्रशासन इसे सरकारी भूमि बता रहा है, जबकि पट्टाधारक इसे निजी संपत्ति होने का दावा कर रहे हैं। दुकानदार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिलाधिकारी को सड़क की पैमाइश करने और अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे।
लाभचंद मार्केट का यह विवाद करीब आठ दशक पुराना है, जो मुख्य रूप से नजूल भूमि के स्वामित्व और पट्टे की शर्तों के उल्लंघन से जुड़ा है। यह भूमि मूल रूप से सरकारी (नजूल) थी, जिसे 1940 और 1947 के दौरान विशेष शर्तों के साथ धर्मचंद जैन को पट्टे पर दिया गया था। आरोप है कि पट्टे की शर्तों के विरुद्ध यहाँ अवैध व्यावसायिक निर्माण किया गया और दुकानों को किराए पर उठा दिया गया। शर्तों के उल्लंघन पर अप्रैल 2025 में नगर निगम ने पट्टा निरस्त कर दिया था। प्रशासन इसे सरकारी भूमि बता रहा है, जबकि पट्टाधारक इसे निजी संपत्ति होने का दावा कर रहे हैं। दुकानदार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिलाधिकारी को सड़क की पैमाइश करने और अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे।
इन संपत्तियों के रिकॉर्ड भी गायब
कलेक्ट्रेट और संबंधित विभागों के अभिलेखागारों की बदहाली का आलम यह है कि कई अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों के रिकॉर्ड भी गायब हैं। इन्हें ट्रेस कराने की कोशिश तक प्रशासनिक अधिकारियों ने नहीं की।
कलेक्ट्रेट और संबंधित विभागों के अभिलेखागारों की बदहाली का आलम यह है कि कई अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों के रिकॉर्ड भी गायब हैं। इन्हें ट्रेस कराने की कोशिश तक प्रशासनिक अधिकारियों ने नहीं की।
मौजा घटवासन: कलेक्ट्रेट अभिलेखागार से इस क्षेत्र का मूल सजरा प्लान (नक्शा) गायब है। उचित रखरखाव न होने से रिकॉर्ड नष्ट हो चुके हैं।
जोंस मिल: निबंधन विभाग के केंद्रीय अभिलेखागार से जोंस मिल के पुराने बैनामों का रिकॉर्ड गायब है। जिल्द और बही के पन्ने फटे हुए मिले हैं।
सिंचाई विभाग की भूमि: शहर क्षेत्र में नगर निगम को हस्तांतरित की गई सिंचाई विभाग की 50 हजार वर्ग मीटर भूमि का रिकॉर्ड गायब है, जिस पर कब्जे हो चुके हैं।
जोंस मिल: निबंधन विभाग के केंद्रीय अभिलेखागार से जोंस मिल के पुराने बैनामों का रिकॉर्ड गायब है। जिल्द और बही के पन्ने फटे हुए मिले हैं।
सिंचाई विभाग की भूमि: शहर क्षेत्र में नगर निगम को हस्तांतरित की गई सिंचाई विभाग की 50 हजार वर्ग मीटर भूमि का रिकॉर्ड गायब है, जिस पर कब्जे हो चुके हैं।
मांगी है विशेषज्ञों की मदद
जिलाधिकारी अरविंद बंगारी ने बताया कि कुछ पुराने रिकॉर्ड नहीं मिल रहे हैं, जिससे भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में बाधा आ रही है। इस संबंध में राजस्व परिषद के विशेषज्ञों से तकनीकी मार्गदर्शन और मदद मांगी गई है।
जिलाधिकारी अरविंद बंगारी ने बताया कि कुछ पुराने रिकॉर्ड नहीं मिल रहे हैं, जिससे भूमि की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने में बाधा आ रही है। इस संबंध में राजस्व परिषद के विशेषज्ञों से तकनीकी मार्गदर्शन और मदद मांगी गई है।