Research: एएमयू ने की स्मार्ट तकनीकि विकसित, अब एआई बताएगा जंगल से गांव कब आ रहे जानवर
एएमयू के वन्यजीव विभाग में विकसित प्रणाली खास तौर पर उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी मानी जा रही है, जहां अक्सर तेंदुआ, हाथी, नीलगाय, जंगली सूअर या अन्य वन्यजीव आबादी के करीब पहुंच जाते हैं।
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जंगल से निकलकर गांव, खेत और आबादी वाले इलाकों में पहुंचने वाले वन्यजीवों की आहट अब पहले ही मिल सकेगी। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के शोधकर्ताओं ने ऐसी एआई आधारित स्मार्ट तकनीक विकसित की है, जो जंगली जानवरों की गतिविधि पहचानकर समय रहते अलर्ट जारी करेगी। मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से तैयार इस तकनीक के डिजाइन को पेटेंट भी मिल गया है।
एएमयू के वन्यजीव विभाग में विकसित वाइल्डलाइफ सेंटिनल इंट्रूजन डिटेक्शन सिस्टम को प्रो. उरूस इलियास और शोधार्थी शहजादा इकबाल ने अनवर हुसैन आजाद के सहयोग से तैयार किया है। यह प्रणाली खास तौर पर उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी मानी जा रही है, जहां अक्सर तेंदुआ, हाथी, नीलगाय, जंगली सूअर या अन्य वन्यजीव आबादी के करीब पहुंच जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में तेंदुआ और गुलदार के गांवों में घुसने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। वहीं तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के सीमावर्ती इलाकों में हाथियों के झुंड फसलों और बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। यदि यह तकनीक वहां लागू होती है तो समय रहते चेतावनी मिलने से जान-माल के नुकसान और संघर्ष की घटनाओं में कमी लाई जा सकती है।
सौर ऊर्जा से चलेगा सिस्टम
शोधकर्ताओं के अनुसार यह तकनीक सौर ऊर्जा से संचालित होगी, इसलिए इसे बिजली विहीन वन क्षेत्रों, खेत किनारों और दूरदराज इलाकों में भी लगाया जा सकेगा। इसमें मोशन सेंसर, हाई रिजॉल्यूशन कैमरे, इन्फ्रारेड सेंसर, थर्मल इमेजिंग और एआई आधारित विश्लेषण प्रणाली जोड़ी गई है। यह सिस्टम किसी भी हलचल को महसूस करते ही सक्रिय हो जाएगा। कैमरे और सेंसर तस्वीर व गतिविधि रिकॉर्ड करेंगे और एआई जानवर की प्रजाति पहचानने या झुंड का अनुमान लगाकर कंट्रोल रूम अलर्ट भेजेगा।
अभी मानव निगरानी पर निर्भरता
अब तक ऐसे क्षेत्रों में वन विभाग को गश्त, चौकसी दल, स्थानीय सूचना तंत्र और पारंपरिक उपायों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसमें समय अधिक लगता है और कई बार सूचना देर से मिलती है। नई तकनीक इस कमी को दूर कर सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि मानव और वन्यजीव के बीच संघर्ष के अलावा यह तकनीक खेतों में घुसकर फसल नुकसान करने वाले नीलगाय और जंगली सूअर जैसे जानवरों की निगरानी में भी उपयोगी साबित हो सकती है। समय पर अलर्ट मिलने से किसान और ग्रामीण सतर्क हो सकेंगे।
यह भी जानें
- भारत में हर साल हाथी-मानव संघर्ष में सैंकड़ों लोगों की मौत होती है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार 2019-2024 के बीच 2,900 से अधिक लोगों की मौत हाथी हमलों में दर्ज की गई। इसी अवधि में 500 से ज्यादा हाथियों की भी मौत संघर्ष, ट्रेन हादसे, बिजली करंट आदि कारणों से हुई।
- उत्तर प्रदेश में 2010-2021 के बीच ऐसे 1,606 मामले दर्ज हुए। प्रमुख संघर्षों में तेंदुए (616 मामले), हाथी (478) और बाघ (365) शामिल हैं।
कहां सबसे ज्यादा उपयोगी होगी तकनीक
पूर्वी यूपी में तेंदुआ-गुलदार, तराई क्षेत्र में बाघ-हाथी, तमिलनाडु में हाथी, राजस्थान व मध्यप्रदेश में तेंदुआ और पश्चिमी यूपी में नीलगाय-जंगली सूअर।
