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NEP: एएमयू में नई शिक्षा नीति पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू, नौ राज्यों के 40 प्रतिभागियों ने किया मंथन
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
Published by: चमन शर्मा
Updated Sun, 11 Jan 2026 12:04 PM IST
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सार
अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की महासचिव एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशा मिश्रा ने कहा कि सतत शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें वैज्ञानिक चेतना, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
संगोष्ठी में संबोधित करतीं भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशा मिश्रा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अलीगढ़ मुस्लिम विश्व्विद्यानलय के प्रौढ ़शिक्षा एवं सतत विस्तार केन्द्र ने भारत ज्ञान विज्ञान समीति के सहयोग से नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर कला संकाय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। जिसमें मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली सहित देश के नौ राज्यों से लगभग 40 प्रतिभागियों ने मंथन किया।
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एएमयू वीसी प्रोफेसर नइमा खातून ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करना या डिग्री प्रदान करना नहीं है, बल्कि समाज के प्रति ज़िम्मेदार, संवेदनशील और जागरूक नागरिक तैयार करना है। सहकुलपति प्रोफेसर एम मोहसिन खान ने कहा कि देश के हरेक शिक्षित व्यक्ति का यह दायित्व है कि वह समाज के प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर बनाये ताकि उनकी भी समाज एवं देश निर्माण में सक्रिय भूमिका हो सके।
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भारत ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने कहा कि भारत में साक्षरता आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1990 में हुई थी, जिसने समाज में गहरा और दूरगामी प्रभाव डाला। उस दौर में देश के लगभग 15 करोड़ असाक्षर नागरिक साक्षरता केंद्रों से जुड़े और करीब डेढ़ करोड़ स्वयंसेवकों ने उन्हें पढ़ाने का कार्य किया। अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की महासचिव एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आशा मिश्रा ने कहा कि सतत शिक्षा केवल साक्षरता तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें वैज्ञानिक चेतना, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
प्रौढ़ शिक्षा एवं सतत विस्तार केन्द्र के निदेशक, डा शमीम अख्तर ने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं को विकसित करने का सशक्त माध्यम बन चुकी है। प्रो. टी.एन. सतीशन ने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजन शिक्षा जगत और समाज के बीच सेतु का कार्य करते हैं तथा नई वैचारिक दिशाओं को जन्म देते हैं।