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Health : नवजात के सांस न लेने की स्थिति में अंबु बैग व सीपीआर का सहारा है जीवन रक्षक

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 31 May 2026 06:54 PM IST
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सार

जन्म के बाद जो नवजात शिशु रोते नहीं है या फिर सांस नहीं ले पाते, उन्हें समय रहते अंबु बैग के जरिए कृतिम ऑक्सीजन देना व सीने को दबाना जरुरी होता है। जो कि नवजात के लिए जीवन रक्षक उपचार है।

Ambu bag and CPR are life-saving measures in case the newborn is not breathing.
मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में आयोजित कार्यशाला में चिकित्सकों को प्रशिक्षण देते विशेषज्ञ। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

जन्म के बाद जो नवजात शिशु रोते नहीं है या फिर सांस नहीं ले पाते, उन्हें समय रहते अंबु बैग के जरिए कृतिम ऑक्सीजन देना व सीने को दबाना जरुरी होता है। जो कि नवजात के लिए जीवन रक्षक उपचार है। यह बातें रविवार को मोती लाल नेहरु मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर प्रीतम दास सभागार में नवजात शिशुओं की जीवन रक्षा से संबंधित एडवांस नियोनेटल रिससिटेशन प्रोवाइडर (एएनआरपी) कार्यशाला के दौरान यूपी नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम के सचिव व लखनऊ आए पीडियाट्रिक्स डॉ. आकाश पंडिता ने कही।

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एमएलएन मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग, इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) की प्रयागराज शाखा व नेशनल आईएपी व नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम की कार्यशाला में मौजूद मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एके वर्मा ने कहा कि भारत सरकार के इंडियन नियोनेटल एक्शन प्लान के तहत नवजात मृत्यु दर को प्रति हजार जीवित जन्म पर 10 से कम लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक नवजात को जन्म के तुरंत बाद प्रशिक्षित व कुशल स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख उपलब्ध हो।

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नवजात के लिए गोल्डन मिनट महत्वपूर्ण

एसआरएन अस्पताल की प्रमुख अधीक्षक डॉ. नीलम सिंह ने कहा कि जन्म के बाद के पहले कुछ मिनट, जिन्हें गोल्डन मिनट्स कहा जाता है, नवजात के जीवन और भविष्य के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। यदि इस अवधि में सही समय पर उचित चिकित्सकीय सहायता मिल जाए तो अनेक नवजातों का जीवन बचाया जा सकता है।

मुख्य अतिथि प्रो. राजीव शरण ने कहा कि नवजात पुनर्जीवन (रेससिटेशन) एक ऐसा कौशल है, जिसमें नियमित अभ्यास और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। वहीं बाल रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष मौर्य ने बताया कि कार्यक्रम में कुल 36 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

बेहतर प्रशिक्षण सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक छह प्रशिक्षुओं पर एक फैसिलिटेटर नियुक्त किया गया था। प्रतिभागियों को बैग-मास्क वेंटिलेशन, श्वास सहायता, नवजात कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन व अन्य जीवनरक्षक तकनीकों का हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम में लखनऊ एसजीपीजीआई की डॉ. अनीता सिंह, लखनऊ के डॉ. सचिन वर्मा, डॉ. प्रमोद कुमार, डॉ. राहुल जायसवाल व बिजनौर की डॉ. इप्शिता ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया।

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