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High Court : 23 साल से आजीवन कारावास की सजा काट रहा आरोपी बरी, पत्नी व तीन बच्चों की हत्या में मिली थी सजा

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 27 Feb 2026 01:56 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या में दोषी ठहराए गए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह नृशंस हत्या जरूर है, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसा पुख्ता और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि हत्या आरोपी ने ही की।

High Court: Accused serving life imprisonment for 23 years acquitted; convicted for murdering wife and three
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और तीन बच्चों की हत्या में दोषी ठहराए गए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह नृशंस हत्या जरूर है, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसा पुख्ता और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि हत्या आरोपी ने ही की। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने आरोपी रईस की ओर से दायर आपराधिक याचिका पर दिया। मामला मुरादाबाद जनपद के गजरौला क्षेत्र का है। याची को ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था। वह करीब 23 साल से जेल में था।

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अभियोजन के अनुसार 29/30 अगस्त 2003 की रात रईस ने पत्नी और तीन बच्चों की गर्दन पर धारदार हथियार से वार कर हत्या कर दी थी। एफआईआर मृतका के मामा ने दर्ज कराई थी। घटना के समय आरोपी का एक बेटा जीवित बचा था, जिसे अभियोजन ने प्रत्यक्षदर्शी बताया था। ट्रायल कोर्ट ने रईस को हत्या में दोषी ठहराया था। ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी।

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हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना देने वाले व्यक्ति का नाम स्पष्ट नहीं किया गया। मृतका के माता-पिता और भाइयों के जीवित होने के बावजूद उन्होंने न तो रिपोर्ट दर्ज कराई, न गवाही दी। जीवित बचे बेटे ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे बयान के लिए ट्यूशन (तैयार) कराया गया था। उसने यह भी कहा कि घटना के समय उसके पिता गांव से बाहर भूसा बेचने गए थे। बाद में फोन पर सूचना मिलने पर लौटे। कोर्ट ने कहा कि इन विरोधाभासों से अभियोजन की कहानी संदेहास्पद हो जाती है।

कोर्ट ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गर्दन पर गहरे घाव थे, जिनसे श्वसन नली, अन्न नली और रीढ़ तक कट जाने की बात कही गई। ऐसे घाव किसी भारी धारदार हथियार के प्रतीत होते हैं, जबकि अभियोजन ने सामान्य चाकू से हत्या का दावा किया और गवाह ने चाकू की बरामदगी से इन्कार किया। आरोपी के शरीर पर चोटों और नाखून उखड़े होने के मेडिकल प्रमाण से पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं।

अभियोजन ने गवाहों के साथ अतिरिक्त न्यायिक स्वीकारोक्ति (एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कंफेशन) का हवाला दिया था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी स्वीकारोक्ति कमजोर साक्ष्य होती है। बिना ठोस पुष्टिकरण के उस पर दोषसिद्धि नहीं टिक सकती। गवाहों के बयान दो माह की देरी से दर्ज होने और उनके आरोपी से विशेष निकटता साबित न होने के कारण कोर्ट ने इन्हें अविश्वसनीय माना।

सम्मेलनों से स्थिति नहीं सुधरेगी, बुनियादी ढांचे में ठोस बढ़ोतरी हो

कोर्ट ने कहा याची की सजा वास्तव में अभी खत्म नहीं हुई है। असली कठिनाई उसके जेल से बाहर आने के बाद शुरू होगी। संभव है कि उसके माता-पिता और भाई-बहन अब जीवित न हों। पत्नी और तीन बच्चों की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। उसका एक बेटा जिंदा है, जिसकी उम्र अब लगभग 25-26 वर्ष होगी। यह भी निश्चित नहीं है कि वह अपने पिता को अपने घर में स्वीकार करेगा या नहीं। कोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी अपीलों पर निर्णय करना गंभीर और मेहनत भरा कार्य है। न्यायाधीशों की संख्या, स्टाफ और बुनियादी ढांचे में ठोस बढ़ोतरी की आवश्यकता है। केवल बैठकों और सम्मेलनों से स्थिति में सुधार नहीं होगा।

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