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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court: Child born out of wedlock and the mother entitled to maintenance; Family Court order set aside.

High Court : बिना शादी जन्मी संतान और उसकी मां भरण-पोषण की हकदार, फेमिली कोर्ट  का आदेश रद्द

Sat, 11 Jul 2026 08:03 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 11 Jul 2026 08:03 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना शादी जन्मी संतान और उसकी मां भरण-पोषण की हकदार है। विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में उन्हें दर-दर भटकने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। पिता का कर्तव्य है कि वह अपनी वैध या अवैध संतान का पालन पोषण करें।

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High Court: Child born out of wedlock and the mother entitled to maintenance; Family Court order set aside.
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना शादी जन्मी संतान और उसकी मां भरण-पोषण की हकदार है। विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में उन्हें दर-दर भटकने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। पिता का कर्तव्य है कि वह अपनी वैध या अवैध संतान का पालन पोषण करें।

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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अचल सचदेव न की अदालत ने महाराजगंज परिवार न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला को भरण-पोषण देने से यह कहते इन्कार कर दिया गया कि उसके पास वैध विवाह का कोई कागजी प्रमाण नहीं हैं।
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याची महिला ने गोरखपुर के एक डिग्री कालेज में तैनात लैब टैक्निशियन से अपने व बच्चें के लिए गुजारा भत्ते की मांग की। दावा किया कि दोनों ने 21 सितंबर 2017 को कोर्ट मैरिज करने के लिए विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन किया था। लेकिन कार्यवाही पूरी किये बिना साथ रहने लगे। आरोप है कि इसकी जानकारी होने पर पति के घर वालों दहेज की मांग को लेकर सताने लगे।
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इसी दौरान एक बेटे का जन्म हुआ। 2019 में दोनों को मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। वह नाबालिग बेटे संग मायके में रहने लगी। दूसरी ओर, पति ने विवाह की वैधता से इन्कार कर दिया। लेकिन यह स्वीकार किया कि दोनों ने कोर्ट मैरिज के लिए आवेदन किया था, साथ रहे थे और उनके संबंध से एक बेटे का जन्म हुआ।

विवाह प्रमाण पत्र के अभाव में परिवार न्यायालय ने महिला का दावा खारिज कर दिया। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय ने पति की कबूलनामें पर विचार किए बिना तकनीकी आधार पर पत्नी का दावा खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कहा भरण-पोषण के मामलों में तकनीकी दृष्टिकोण नहीं बल्कि सामाजिक न्याय आधारित उद्देश्यपूर्ण व्याख्या अपनाई जानी चाहिए।


लिहाजा, कोर्ट ने महिला की पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बेटे को पांच हजार रुपये महीना भरण-पोषण के दिये जाने के आदेश को बरकरार रखा। वहीं, महिला के दावे पर नए सिरे से विचार के लिए मामला परिवार न्यायालय वापस भेज दिया। भरण-पोषण के प्रावधान कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य बेसहारा महिलाओं और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करना है। विवाह की तकनीकी परिभाषाओं में उलझा कर उन्हें इससे वंचित करना कानून की मूल भावना के विपरीत है - हाईकोर्ट

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