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High Court : उच्च शिक्षा के कारण भरण-पोषण न देना महिला को दर-दर का भिखारी बनाने जैसा है

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 11 Jan 2026 01:42 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महिला कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, परिवार की सेवा से नहीं भागती। खुशी से ससुराल की देहरी लांघ मायके की शरण नहीं लेती। हालात उसे मजबूर करते हैं। उच्च शिक्षा उसके संघर्षपूर्ण जीवन का कवच है।

High Court Denying maintenance due to higher education is tantamount to turning a woman into a beggar
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महिला कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, परिवार की सेवा से नहीं भागती। खुशी से ससुराल की देहरी लांघ मायके की शरण नहीं लेती। हालात उसे मजबूर करते हैं। उच्च शिक्षा उसके संघर्षपूर्ण जीवन का कवच है। इसका इस्तेमाल उसके खिलाफ हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। उच्च शिक्षा के कारण भरण-पोषण से वंचित करना, उसे दर-दर का भिखारी बनाने जैसा है।इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने बुलंदशहर के परिवार न्यायालय की ओर से महिला की भरण-पोषण की मांग में अर्जी खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया।

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साथ ही एक माह में पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए भरण-पोषण पर नए सिरे से संवेदनशील और न्यायसंगत फैसला करने का आदेश दिया है। याची का विवाह बुलंदशहर के एक प्राथमिक विद्यालय में तैनात चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के साथ 20 मई 2006 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। मतभेद के कारण इस विवाह से जन्मा एक पुत्र मां के साथ ननिहाल में रह रहा। महिला ने परिवार न्यायालय बुलंदशर में भरण-पोषण की मांग को अर्जी दाखिल की।
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परिवार न्यायालय के अपर प्रधान न्यायाधीश की अदालत ने तीन अक्तूबर 2024 को पत्नी के भरण-पोषण की मांग इस आधार पर खारिज कर दी कि वह उच्च शिक्षित है और व्यावसायिक शिक्षा ली है। अपना पालन पोषण खुद करने में सक्षम है। नाबालिग पुत्र के भरण-पोषण के लिए 3,000 रुपये प्रति माह भुगतान का आदेश दिया। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची ने कोर्ट से खुद के लिए भरण-पोषण तय करने व बेटे को मिलने वाली राशि तीन हजार से बढ़ा कर 10 हजार रुपये प्रतिमाह करने की गुहार लगाई।

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