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न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त: जिनके हिंदी के फैसलों ने रोका 'सुप्रीम' रास्ता, अंग्रेजी लिखने से किया था इनकार

Tue, 15 Sep 2026 04:42 AM IST
Digvijay Singh शशांक वर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज
शशांक वर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: Digvijay Singh Updated Tue, 15 Sep 2026 04:42 AM IST
सार

हाईकोर्ट में हिंदी यात्रा की कहानी न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त का नाम लिए बिना अधूरी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे जस्टिस, जिन्होंने अंग्रेजियत की परंपरा तोड़ अपने सभी फैसले हिंदी में दिए। हिंदी में लिखने के संकल्प के कारण वह सुप्रीम कोर्ट नहीं गए, क्योंकि वहां अंग्रेजी चलती थी, और वह एक भी आदेश अंग्रेजी में लिखने को तैयार न थे।
 

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Justice Premshankar Gupta His Hindi judgments blocked his path to the Supreme Court he had refused to write in
न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाईकोर्ट में हिंदी यात्रा की कहानी न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त का नाम लिए बिना अधूरी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे जस्टिस, जिन्होंने अंग्रेजियत की परंपरा तोड़ अपने सभी फैसले हिंदी में दिए। हिंदी में लिखने के संकल्प के कारण वह सुप्रीम कोर्ट नहीं गए, क्योंकि वहां अंग्रेजी चलती थी, और वह एक भी आदेश अंग्रेजी में लिखने को तैयार न थे।

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न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त के बेटे सीनियर एडवोकेट प्रदीप कुमार ने बताया कि उनकी निर्णय क्षमता से सुप्रीम कोर्ट काफी प्रभावित था। ऐसे मौके भी आए जब उनसे अपेक्षा की गई कि वह एक-दो आदेश अंग्रेजी में दे दें तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया जाए, लेकिन वह तैयार नहीं हुए। इतना ही नहीं, एक बार उन्हें तमिलनाडु के मद्रास हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाना था। इस पर उन्होंने कहा था कि साथी जज की मदद से तमिल में फैसले लिखवा देंगे पर अंग्रेजी में नहीं। 
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लैटिन में बहस शुरू की तो हिंदी बोलने की मिली इजाजत
एडवोकेट प्रदीप बताते हैं कि वर्ष 1972-73 के आसपास यूपी में चर्चित शमीम रहमानी का केस यहां आया। शमीम ने अपने प्रेमी की उसी की बंदूक से हत्या कर दी थी। पिता जी सरकारी वकील थे, उन्हें हिंदी में बहस करने से मना कर दिया गया। फिर उन्होंने लीगल डिक्शनरी से लैटिन के शब्द छांटे। तैयारी कर लैटिन में बहस करने लगे। जज इसलिए मना नहीं कर सके, क्योंकि लैटिन लीगल लैंग्वेज थी। जजों को जब मुश्किल हुई तो उन्होंने हिंदी में बहस की अनुमति दी।
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संघर्ष कर पहुंचे थे इलाहाबाद हाईकोर्ट
एडवोकेट प्रदीप बताते हैं, वह लोग मूलत: इटावा के रहने वाले हैं। आज भी परिवार संयुक्त है। उनके बाबा की मृत्यु हुई तो घर के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का जिम्मा उनके ताऊ जी पर आ गया। पिता जी के बीए करने के बाद ताऊ जी ने उनसे कारोबार संभालने को कहा, क्योंकि उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी। तब बमुश्किल चोरी-छिपे उन्होंने एलएलबी किया। 1977 से 1992 तक 40,000 से ज्यादा फैसले हिंदी में दिए।


आपातकाल के दौरान हिंदी में आया था पहला आदेश
आपातकाल के दौरान मीसा बंदियों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। चीफ जस्टिस की पूर्ण पीठ ने सुनवाई की थी। तब चीफ जस्टिस एनबी अस्थाना ने अपना आदेश हिंदी में दिया था।

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