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High Court : मजिस्ट्रेट शुरुआती चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद भी क्लोजर रिपोर्ट पर विचार करने के लिए बाध्य
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 18 Feb 2026 01:18 PM IST
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सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट ने किसी मामले में पुलिस की शुरुआती चार्जशीट पर अपराध का संज्ञान ले लिया हो, तब भी वह बाद में दाखिल की गई फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) पर विचार करने और उस पर आदेश पारित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।
अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट ने किसी मामले में पुलिस की शुरुआती चार्जशीट पर अपराध का संज्ञान ले लिया हो, तब भी वह बाद में दाखिल की गई फाइनल रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) पर विचार करने और उस पर आदेश पारित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। यदि मजिस्ट्रेट फाइनल रिपोर्ट पर विचार किए बिना आगे की कार्यवाही करते हैं तो प्रक्रिया गैर-कानूनी मानी जाएगी। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस अनिल कुमार दशम की एकल पीठ ने सोनू और अन्य की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश सहित सभी परिणामी आदेशों को रद्द कर दिया।
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कन्नौज के कोतवाली थाने में पुलिस ने 15 सितंबर 2023 को याचियों के खिलाफ दंगा, मारपीट और एससी/एसटी एक्ट समेत गंभीर धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी। इस पर मजिस्ट्रेट ने 21 दिसंबर 2023 को संज्ञान ले लिया। इसके बाद आगे की जांच में 31 मार्च 2024 को सप्लीमेंट्री रिपोर्ट (फाइनल रिपोर्ट) दाखिल की गई, जिसमें आरोपों को झूठा बताया गया। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने सात अगस्त 2025 को फाइनल रिपोर्ट पर विचार किए बिना आरोप तय करने की कार्यवाही शुरू कर दी। याचियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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कोर्ट ने कहा कि कई बार मजिस्ट्रेट यह मान लेते हैं कि एक बार चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद वे कार्य पूरा कर लेने पर (फंक्शन ऑफिशियो) हो जाते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-362 के तहत अपने आदेश की समीक्षा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेना मामले का अंतिम निपटारा नहीं है। मजिस्ट्रेट की न्यायिक जिम्मेदारी तब तक जारी रहती है, जब तक पुलिस अपनी अंतिम रिपोर्ट दाखिल नहीं कर देती।
यदि सप्लीमेंट्री रिपोर्ट पर विचार करने के बाद मजिस्ट्रेट पहले के आदेश से अलग निष्कर्ष पर पहुंचते हैं तो इसे रिव्यू या रिकॉल नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने विनय त्यागी बनाम इरशाद अली और अन्य सहित अन्य फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि सप्लीमेंट्री रिपोर्ट प्राइमरी रिपोर्ट से अलग नहीं, बल्कि उसका हिस्सा होती है। इसलिए अदालत को दोनों रिपोर्टों को साथ पढ़कर यह तय करना चाहिए कि प्रथम दृष्टया अपराध बनता है या नहीं।