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Ambedkar Nagar News: खाता खोलने के दो दिन बाद अमित के खाते में पहुंची थी रकम
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अंबेडकरनगर। अकबरपुर के पीरपुर दुबरा लोरपुर निवासी जिस अमित के खिलाफ पुलिस ने धोखाधड़ी व आईटी एक्ट की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है, उसने 21 मई को इंडसइंड बैंक अकबरपुर में अपना खाता खोला था। खाता खोलने के दो दिन बाद ही साइबर जालसाजों ने महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा के तीन खातों से एक लाख 37 हजार रुपये की ठगी की रकम उसके खाते में भेजी थी।
आरोपी ने 23 मई और 25 मई को दो बार में एक लाख छह हजार रुपये की निकासी की। खाते से रुपये की निकासी के बाद से ही वह साइबर पुलिस के रडार पर था। पुलिस अब तक 50 के करीब म्यूल खातों को फ्रीज करा चुकी है। अब अमित से पूछताछ कर साइबर गैंग के लीडर तक पहुंचने को कोशिश में है।
म्यूल अकाउंट क्या होते हैं
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक अकाउंट होते हैं, जिनका इस्तेमाल जालसाज अपराध से मिले पैसे को ठिकाने लगाने के लिए करते हैं। आजकल, बड़ी संख्या में नकद रखने या इस्तेमाल करने के लिए बहुत सख्त कानून हैं। अगर वे अपने खुद के अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं, तो केवाईसी नियमों की वजह से उन्हें पकड़ना आसान होता है। इससे बचने के लिए अपराधी किसी तीसरे व्यक्ति के बैंक अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं। हो सकता है कि इस तीसरे व्यक्ति को पता भी न हो कि वे अपराधियों के लिए काम कर रहे हैं।
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अपना खाता किसी को उपयोग न करने दें
साइबर ठग पहले ठगी की गई रकम को एक डंप अकाउंट में जमा करते हैं। चंद मिनटों में रकम कई खातों में बांट दी जाती है। इसके बाद एटीएम निकासी, क्रिप्टोकरेंसी और ऑनलाइन शॉपिंग के जरिये पैसा सिस्टम से बाहर कर दिया जाता है। इसी कारण पीड़ितों को पूरी रकम वापस मिल पाना मुश्किल हो जाता है। बिना अनुमति के किसी को भी अपना खाता उपयोग करने के लिए न दें। वरना आप साइबर जालसाजी के चक्कर में फंस सकते हैं। सावधानी ही बचाव है।
- रंधा सिंह, थानाध्यक्ष साइबर थाना
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आरोपी ने 23 मई और 25 मई को दो बार में एक लाख छह हजार रुपये की निकासी की। खाते से रुपये की निकासी के बाद से ही वह साइबर पुलिस के रडार पर था। पुलिस अब तक 50 के करीब म्यूल खातों को फ्रीज करा चुकी है। अब अमित से पूछताछ कर साइबर गैंग के लीडर तक पहुंचने को कोशिश में है।
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म्यूल अकाउंट क्या होते हैं
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक अकाउंट होते हैं, जिनका इस्तेमाल जालसाज अपराध से मिले पैसे को ठिकाने लगाने के लिए करते हैं। आजकल, बड़ी संख्या में नकद रखने या इस्तेमाल करने के लिए बहुत सख्त कानून हैं। अगर वे अपने खुद के अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं, तो केवाईसी नियमों की वजह से उन्हें पकड़ना आसान होता है। इससे बचने के लिए अपराधी किसी तीसरे व्यक्ति के बैंक अकाउंट का इस्तेमाल करते हैं। हो सकता है कि इस तीसरे व्यक्ति को पता भी न हो कि वे अपराधियों के लिए काम कर रहे हैं।
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अपना खाता किसी को उपयोग न करने दें
साइबर ठग पहले ठगी की गई रकम को एक डंप अकाउंट में जमा करते हैं। चंद मिनटों में रकम कई खातों में बांट दी जाती है। इसके बाद एटीएम निकासी, क्रिप्टोकरेंसी और ऑनलाइन शॉपिंग के जरिये पैसा सिस्टम से बाहर कर दिया जाता है। इसी कारण पीड़ितों को पूरी रकम वापस मिल पाना मुश्किल हो जाता है। बिना अनुमति के किसी को भी अपना खाता उपयोग करने के लिए न दें। वरना आप साइबर जालसाजी के चक्कर में फंस सकते हैं। सावधानी ही बचाव है।
- रंधा सिंह, थानाध्यक्ष साइबर थाना