{"_id":"6a512846793b724ca20a7b4b","slug":"two-accused-acquitted-in-33-year-old-sc-st-act-case-ambedkar-nagar-news-c-91-1-abn1014-160306-2026-07-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ambedkar Nagar News: एससी-एसटी एक्ट के 33 साल पुराने मामले में दो आरोपी बरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Ambedkar Nagar News: एससी-एसटी एक्ट के 33 साल पुराने मामले में दो आरोपी बरी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंबेडकरनगर। अकबरपुर क्षेत्र में करीब 33 साल पुराने एससी-एसटी एक्ट और मारपीट के मामले में विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट पवन कुमार शुक्ला ने दो आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। कोर्ट ने सूबेदार का पूरा (लालापुर) निवासी राजितराम और जगन्नाथ को आरोपों से बरी कर दिया।
अकबरपुर थाने में वर्ष 1993 में दर्ज मुकदमे में मेवालाल, साधू, राजितराम और जगन्नाथ आरोपी बनाए गए थे। विचारण के दौरान मेवालाल और साधू की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त कर दी गई थी। शेष दोनों आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी।
द्वारिका प्रसाद ने आरोप लगाया था कि 16 मार्च 1993 की सुबह मेवालाल, साधू, राजितराम और टिल्लू लाठी-डंडों से लैस होकर पहुंचे और उनके साथ मारपीट कर जान से मारने की धमकी दी। विवेचना के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। वर्ष 2003 में मामला सत्र न्यायालय भेजा गया और 2004 में आरोप तय हुए। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने दो गवाह पेश किए। द्वारिका प्रसाद ने घटना का समर्थन किया, जबकि सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक रामनिहोर ने जीडी, नक्शा नजरी और आरोप पत्र जैसे दस्तावेजों को प्रमाणित किया।
विज्ञापन
कोर्ट ने वादी की गवाही में विवादित जमीन को लेकर विरोधाभास पाया। वादी ने मुख्य परीक्षा में जमीन को अपना बताया जबकि जिरह में उसे आबादी की जमीन और आरोपियों के कब्जे में होना स्वीकार किया। न्यायालय ने कहा कि स्वामित्व, कब्जे के अलावा घटना की तारीख, समय और स्थान को लेकर भी उसकी गवाही स्पष्ट नहीं रही। रामनिहोर ने दस्तावेज की पुष्टि की लेकिन घटना के तथ्यों की जानकारी होने से इन्कार किया। कोर्ट ने कहा कि उनकी गवाही आरोपों को साबित करने में सहायक नहीं रही। विशेष न्यायालय ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। इसके बाद राजितराम और जगन्नाथ को दोषमुक्त कर दिया गया। दोनों के जमानत बंधपत्र निरस्त कर अपील की स्थिति में 20-20 हजार रुपये के दो प्रतिभू सहित नए बंधपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया।
विज्ञापन
अकबरपुर थाने में वर्ष 1993 में दर्ज मुकदमे में मेवालाल, साधू, राजितराम और जगन्नाथ आरोपी बनाए गए थे। विचारण के दौरान मेवालाल और साधू की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त कर दी गई थी। शेष दोनों आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही थी।
विज्ञापन
द्वारिका प्रसाद ने आरोप लगाया था कि 16 मार्च 1993 की सुबह मेवालाल, साधू, राजितराम और टिल्लू लाठी-डंडों से लैस होकर पहुंचे और उनके साथ मारपीट कर जान से मारने की धमकी दी। विवेचना के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। वर्ष 2003 में मामला सत्र न्यायालय भेजा गया और 2004 में आरोप तय हुए। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने दो गवाह पेश किए। द्वारिका प्रसाद ने घटना का समर्थन किया, जबकि सेवानिवृत्त उपनिरीक्षक रामनिहोर ने जीडी, नक्शा नजरी और आरोप पत्र जैसे दस्तावेजों को प्रमाणित किया।
विज्ञापन
कोर्ट ने वादी की गवाही में विवादित जमीन को लेकर विरोधाभास पाया। वादी ने मुख्य परीक्षा में जमीन को अपना बताया जबकि जिरह में उसे आबादी की जमीन और आरोपियों के कब्जे में होना स्वीकार किया। न्यायालय ने कहा कि स्वामित्व, कब्जे के अलावा घटना की तारीख, समय और स्थान को लेकर भी उसकी गवाही स्पष्ट नहीं रही। रामनिहोर ने दस्तावेज की पुष्टि की लेकिन घटना के तथ्यों की जानकारी होने से इन्कार किया। कोर्ट ने कहा कि उनकी गवाही आरोपों को साबित करने में सहायक नहीं रही। विशेष न्यायालय ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। इसके बाद राजितराम और जगन्नाथ को दोषमुक्त कर दिया गया। दोनों के जमानत बंधपत्र निरस्त कर अपील की स्थिति में 20-20 हजार रुपये के दो प्रतिभू सहित नए बंधपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया।