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Amethi News: बीज कारोबार से बदली आराधना की जिदंगी
संवाद न्यूज एजेंसी, अमेठी
Updated Fri, 01 May 2026 12:34 AM IST
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भादर के घोरहा गांव में फूल का बीज निकालती आराधना सिंह। स्रोत: स्वयं
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अमेठी सिटी। भादर के घोरहा गांव की रहने वाली आराधना सिंह ने अपने बचपन के शौक को आय का जरिया बना लिया है। फूलों और बागवानी के प्रति शुरुआती लगाव ने उन्हें बीज उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ाया। अब उनके द्वारा तैयार बीज देश के कई हिस्सों तक पहुंच रहे हैं। इस पहल से गांव में काम के अवसर बढ़े हैं और महिलाएं घर के पास रोजगार से जुड़ी हैं।
आराधना ने अंग्रेजी विषय से स्नातक किया। सैन्य कर्मी के परिवार में पली-बढ़ी होने से अनुशासन और आत्मविश्वास उनके स्वभाव में रहा। वर्ष 2012 में घोरहा गांव निवासी हेमंत सिंह से विवाह हुआ। इसके बाद परिवार दिल्ली में रहा, जहां आर्थिक दबाव बना रहा। बाद में उन्होंने गांव लौटकर नया काम शुरू किया। शिक्षण कार्य के दौरान सोशल मीडिया से मिले सुझाव पर उन्होंने फूलों की खेती अपनाई।
2500 रुपये से शुरुआत कर पहले प्रयास में आठ हजार रुपये की आमदनी की। इसके बाद गोल्ड ऋण लेकर काम का विस्तार किया। शुरुआती दौर में नकारात्मक टिप्पणियां भी सामने आईं, मगर उन्होंने प्रयास जारी रखा। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा और पहचान बनी। अब जिन नर्सरियों से पहले बीज लिया जाता था, वहीं उनसे बीज मंगवाए जाते हैं। कोरोना काल में डिजिटल माध्यम अपनाने से काम का दायरा बढ़ा और बीज कई राज्यों तक पहुंचने लगे। वर्तमान में उनके साथ 10 से 15 महिलाएं काम कर रही हैं।
नर्सरी में तैयार किए जाते हैं ये बीज
इनकी नर्सरी में मार्लिश, रजनीगंधा, रेन लिली, सूरजमुखी, कमल और कुमुदिनी जैसी कई प्रजातियों के बीज तैयार किए जाते हैं। गुणवत्ता पर ध्यान रहने से अंकुरण बेहतर होता है। ग्राहक दोबारा मांग करते हैं और नई किस्मों पर भी काम जारी है।
डिजिटल माध्यम से बढ़ा काम
डिजिटल प्लेटफॉर्म से बिक्री का दायरा बढ़ा। पहले सीमित क्षेत्र तक सीमित काम अब कई राज्यों तक पहुंच गया है। ऑनलाइन ऑर्डर लेकर समय पर आपूर्ति की जाती है। पैकिंग व्यवस्था में सुधार से काम अधिक व्यवस्थित हुआ है।
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आराधना ने अंग्रेजी विषय से स्नातक किया। सैन्य कर्मी के परिवार में पली-बढ़ी होने से अनुशासन और आत्मविश्वास उनके स्वभाव में रहा। वर्ष 2012 में घोरहा गांव निवासी हेमंत सिंह से विवाह हुआ। इसके बाद परिवार दिल्ली में रहा, जहां आर्थिक दबाव बना रहा। बाद में उन्होंने गांव लौटकर नया काम शुरू किया। शिक्षण कार्य के दौरान सोशल मीडिया से मिले सुझाव पर उन्होंने फूलों की खेती अपनाई।
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2500 रुपये से शुरुआत कर पहले प्रयास में आठ हजार रुपये की आमदनी की। इसके बाद गोल्ड ऋण लेकर काम का विस्तार किया। शुरुआती दौर में नकारात्मक टिप्पणियां भी सामने आईं, मगर उन्होंने प्रयास जारी रखा। धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ा और पहचान बनी। अब जिन नर्सरियों से पहले बीज लिया जाता था, वहीं उनसे बीज मंगवाए जाते हैं। कोरोना काल में डिजिटल माध्यम अपनाने से काम का दायरा बढ़ा और बीज कई राज्यों तक पहुंचने लगे। वर्तमान में उनके साथ 10 से 15 महिलाएं काम कर रही हैं।
नर्सरी में तैयार किए जाते हैं ये बीज
इनकी नर्सरी में मार्लिश, रजनीगंधा, रेन लिली, सूरजमुखी, कमल और कुमुदिनी जैसी कई प्रजातियों के बीज तैयार किए जाते हैं। गुणवत्ता पर ध्यान रहने से अंकुरण बेहतर होता है। ग्राहक दोबारा मांग करते हैं और नई किस्मों पर भी काम जारी है।
डिजिटल माध्यम से बढ़ा काम
डिजिटल प्लेटफॉर्म से बिक्री का दायरा बढ़ा। पहले सीमित क्षेत्र तक सीमित काम अब कई राज्यों तक पहुंच गया है। ऑनलाइन ऑर्डर लेकर समय पर आपूर्ति की जाती है। पैकिंग व्यवस्था में सुधार से काम अधिक व्यवस्थित हुआ है।
