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Baghpat News: 100 साल पुरानी परंपरा से होली का जश्न शुरू, लोगों ने रातभर पीटा ढोल

Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2026 11:45 PM IST
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Holi celebrations begin with a 100-year-old tradition, with people beating drums all night long.
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बागपत। शहर के पुराने कस्बे में सौ साल पुरानी परंपरा से होली का जश्न शुरू हो गया है और वहां सोमवार रातभर लोगों ने ढोल पीटा। ढोल की थाप पर होली के गीत गाए गए तो सरूरपुर कलां गांव में मकानों की छतों पर बुग्गी व बाइकों को चढ़ा दिया गया। अन्य कई गांवों में मंगलवार देर रात से ही हुड़दंग शुरू हो गया। वहीं रमाला गांव में दशकों से चली आ रही परंपरा के तहत होली का दहन नहीं किया गया।
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-ढोल के साथ फाग गाते हुए गलियों में घूमे लोग
बागपत। शहर के पुराने कस्बे में 100 साल पुरानी परंपरा से होली का पर्व सोमवार रात ही मनाना शुरू कर दिया गया। जहां हुरियारों की टोली गलियों में ढोल नगाड़ों के साथ फाग गाते हुए गलियों में घूमे और घर-घर जाकर होली खेलने का न्योता दिया। लोगों ने रातभर ढोल पीटा और होली पर्व पर भाईचारा बनाए रखने और त्योहार को शांति से मनाने की अपील की। पुराना कस्बा निवासी श्रीनिवास चौहान, बॉबी चौहान, पवन चौहान, चौधरी प्रदीप सिंह ने बताया कि कई पीढि़यों से चली आ रही परंपरा का अब भी पालन किया जा रहा है। जिसमें पुराने कस्बे के सभी परिवारों के सदस्य भाग लेते हैं। मोहल्लों के लोग इकट्ठा होकर ढोल नगाड़ों के साथ गीत गाते हुए घर-घर जाते हैं।
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छतों पर बाइकें व बुग्गियों को चढ़ाया
बागपत। सरूरपुर कलां गांव में होली का त्योहार कुछ अलग तरीके से मनाना शुरू कर दिया गया, जहां होली पर दिन निकलने से पहले ही युवाओं ने बाइकें, बुग्गियां समेत अन्य सामान मकानों की छतों पर चढ़ा दिया और पेड़ पर लटकाने के साथ ही तालाब में फेंक दिया गया। सुभाष नैन, हरबीर सिंह, ओमबीर सिंह आदि ने बताया कि खुशियों और उमंगों से भरे होली पर्व को मनाने का अंदाज सभी का अलग-अलग है। गांव में होली का हुड़दंग भी देखने को मिलता है। यहां होली पर्व के आसपास घर आने वाले रिश्तेदारों को भी होली के रंगों में रंगकर विदा किया जाता है। मंगलवार को शाम होते ही युवाओं की टोली पूरे गांव में घूमने लगी और रास्तों में खड़ी बुग्गी, बाइक, साइकिल समेत अन्य वाहनों को उठाकर छतों पर चढ़ा दिया गया।


रमाला में नहीं हुआ होली का दहन
रमाला। रमाला गांव में दशकों पुरानी परंपरा के तहत होलिका का दहन नहीं किया गया। सतेंद्र, मुकेश, राजीव, सुरेश आदि ने बताया कि होलिका दहन के समय दशकों पहले दो बैलों की जलने से मौत हो गई थी और इस कारण गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता है। बैलों की मौत से लोग दुखी हो गए थे। इस परंपरा को आज भी युवा पीढ़ी जिंदा रखे हुए है। अवनीश चौहान व संजीव चौहान ने बताया कि युवा होली जरूर खेलते हैं और एक दूसरे को गुलाल लगाकर परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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