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UP: बीमारी से मौत को बताया दहेज हत्या, आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने की ऐसी टिप्पणी, पढ़कर रूह कांप उठेगी

अमर उजाला नेटवर्क, मुजफ्फरनगर Published by: Mohd Mustakim Updated Wed, 20 May 2026 11:49 PM IST
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सार

Muzaffarnagar News: तितावी क्षेत्र के बुड़ीना कलां में विवाहिता पिंकी की मौत हो गई थी। उसका अंतिम संस्कार भी कर दिया था। इसके करीब चार माह बाद पति व ससुरालियों के खिलाफ दहेज हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई। 

UP: Death due to illness was described as dowry murder, while acquitting the accused
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश/ फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने 13 साल पहले बुड़ीना कलां में पिंकी की मौत के मामले में साक्ष्य के अभाव में पति और सास-ससुर को दोषमुक्त करार दिया। 57 पेज के फैसले में लिखा कि दहेज हत्या व दहेज एक सामाजिक कुरीति है। इससे निपटने के लिए कड़े कानून अनिवार्य हैं लेकिन इनका दुरुपयोग न केवल न्याय प्रणाली पर बोझ बढ़ाता है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाता है। वादी पिता पर एक हजार रुपये का प्रतिकर लगाया गया। मुकदमे के गवाहों को नोटिस जारी किए गए। तत्कालीन एसपी देहात और दो सीओ पर विभागीय कार्रवाई के लिए गृह विभाग को पत्र लिखा है।
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भौराकलां थाना क्षेत्र के सावटू गांव की पिंकी की शादी 25 फरवरी 2007 को तितावी थाना क्षेत्र के बुड़ीना कलां गांव निवासी सोबिन के साथ हुई थी। 23 मई 2013 को पिंकी की मौत हो गई और मायके में उसका अंतिम संस्कार किया गया। करीब चार माह बाद मृतका के पिता मदनपाल ने अतिरिक्त दहेज और बाइक मांगने का आरोप लगाते हुए पति, ससुर जसवीर और सास वीरमति के खिलाफ गला दबाकर हत्या करने की प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
 
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पुलिस ने तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया और आरोपपत्र दाखिल किया। इन दिनों आरोपी जमानत पर हैं। अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका। बीमारी से मौत के मामले की पुष्टि हुई। बुधवार को न्यायालय अपर सत्र न्यायाधीश/ फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन ने फैसला सुनाया। अदालत ने लिखा कि प्रकरण दहेज हत्या के झूठे मुकदमे का सर्वोत्तम उदाहरण है। दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न से जुड़े कानूनों का मुख्य उद्देश्य महिलाओं का सुरक्षा प्रदान करना है लेकिन प्रकरण में वादी मुकदमा ने षड्यंत्र के तहत पूरे परिवार को फंसाया। अदालत ने गवाह मदनपाल, जयवीर सिंह, सुनीता, प्रधान रामधन को नोटिस जारी किया है।
 
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बरी होने तक बीत जाता है जीवन का स्वर्णिम काल
अदालत ने लिखा कि दहेज हत्या के प्रकरणों में पुलिस एफआईआर दर्ज होते ही, बिना किसी निष्पक्ष विवेचना के आरोपियों को जेल भेज देती है। जेल जाते ही समाज में व्यक्ति और उसके परिवार का नाम कलंकित हो जाता है। जमानत मिलने के बाद भी समाज उन्हें शक की नजर से देखता है। जेल के भीतर का वातावरण बहुत कठोर होता है। एक सामान्य पारिवारिक जीवन जीने वाले लोग जब खूंखार अपराधियों के बीच कैद होते हैं तो वह गहरे डिप्रेशन में चले जाते हैं। दहेज हत्या के झूठे मुकदमों में वर्षों जेल में रहने के बाद जब अदालत निर्दोष व्यक्ति को सबूत न होने के कारण दोषमुक्त करती है, तब तक उस व्यक्ति की युवावस्था या जीवन के स्वर्णिम वर्ष बीत चुके होते हैं।
 

आरोपी बाहुबली होते तो ऐसा नहीं करती पुलिस
अदालत ने लिखा कि सीओ कर्मवीर सिंह, सीओ सत्यप्रकाश शर्मा ने विवेचना में लापरवाही बरती। बिना तथ्य के चार्जशीट दाखिल कर दी। तत्कालीन एसपी देहात राकेश कुमार जौली ने मुकदमे का पर्यवेक्षण नहीं किया। अगर आरोपी धनी या बाहुबली होते तो पुलिस ऐसा नहीं करती। अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए अदालत ने पत्र लिखा है।
 

मानसिक तनाव में कर लेते हैं आत्महत्या
अदालत ने लिखा कि दहेज हत्या के मुकदमों में जमानत पाने और सालों-साल मुकदमा लड़ने में लाखों रुपये खर्च हो जाते है, जिससे मध्यम वर्गीय परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह से टूट जाता है। दहेज हत्या के प्रकरणों में प्रायः जिला न्यायालयों से जमानत भी नहीं होती है। दहेज हत्या के झूठे प्रकरणों में हमेशा गिरफ्तारी और सजा का डर, आरोपों को गलत साबित करने की लाचारी और रिश्तेदारों से दूरी उन्हें गंभीर मानसिक तनाव व डिप्रेशन में धकेल देती है। कई मामलों में देखा गया है कि कानूनी सिस्टम की इस लंबी लड़ाई में सबकुछ लुट जाने के कारण निर्दोष व्यक्ति अत्यधिक अवसाद में आकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

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