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Banda News: स्क्रैप माफिया प्रकरण में बांदा के जेलर विक्रम निलंबित, अधीक्षक पर विभागीय जांच
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sun, 01 Feb 2026 12:01 AM IST
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फोटो- 36 जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम। संवाद
- फोटो : प्राइवेट अस्पताल का निरीक्षण करते हुए एसीएमओ। स्रोत: स्वास्थ्य विभाग
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बांदा। गौतमबुद्ध नगर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) अदालत ने गैंगस्टर रवि नागर उर्फ रवि काना के खिलाफ बी-वारंट के बावजूद आरोपी रिहाई मामले में डीजी जेल ने बांदा मंडल कारागार में तैनात जेलर विक्रम सिंह यादव को निलंबित कर दिया है। इसके अलावा बांदा जेल अधीक्षक अनिल गौतम के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए हैं। निलंबन की कार्रवाई होने के बाद दोनों अधिकारियों ने अपने सीयूजी नंबर बंद कर लिए हैं। पूरे मामले की जांच डीआईजी जेल प्रयागराज को सौंपी गई है।
जेल अधीक्षक अनिल गौतम ने बताया कि स्क्रैप माफिया रवि काना को प्रशासनिक आधार पर अगस्त 2024 को गौतमबुद्ध नगर से बांदा मंडल कारागार स्थानांतरित किया गया था। तब से यह यहां कारागार में बंद था। थाना सेक्टर-63 नोएडा में जबरन वसूली और आपराधिक धमकी के मामले में आरोपी को बी वारंट के जरिए न्यायालय में तलब किया गया था और विवेचक द्वारा रिमांड स्वीकृत कराने के लिए प्रार्थना पत्र भी प्रस्तुत किया गया था। 28 जनवरी 2026 को संबंधित प्रकरण पर न्यायालय का बी-वारंट कारागार को प्राप्त हुआ था। जिसमें 29 जनवरी को न्यायालय के समक्ष पेश करने का आदेश था। इस पर आरोपी को वीसी के माध्यम से पेश किया गया था। आरोपी के खिलाफ अन्य सभी मामलों में रिहाई के आदेश पहले से ही प्राप्त हो चुके थे। वह केवल बी-वारंट के मामले में ही बंद था। उसी दिन शाम को आरोपी को जेल से रिहा कर दिया गया था। इसे न्यायालय ने गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना है। इस आधार पर शनिवार को डीजी जेल पीसी मीणा ने तत्काल प्रभाव से बांदा जेलर विक्रम सिंह यादव को निलंबित कर दिया है। इसकी पुष्टि जेल अधीक्षक अनिल गौतम ने की है। उधर, जेल अधीक्षक के खिलाफ भी विभागीय जांच के आदेश हुए हैं। पूरे प्रकरण की जांच डीआईजी जेल प्रयागराज को सौंपी है।
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न तो अभिरक्षा वारंट मिला न अग्रिम पेशी की सूचना मिली
बांदा। जेल अधीक्षक अनिल गौतम ने बताया कि 29 जनवरी 2026 को वीसी से हुई पेशी के बाद कारागार प्रशासन को न तो अभिरक्षा वारंट प्राप्त हुआ और न ही अग्रिम पेशी तिथि की कोई सूचना मिली। 29 जनवरी को ही रवि काना को जेल से रिहा कर दिया था। इस मामले में वह अपना जवाब कोर्ट को दाखिल कर देंगे। इतनी बात कहकर जेल अधीक्षक ने अपना सीयूजी मोबाइल बंद कर लिया है। उधर, जेलर विक्रम सिंह यादव ने भी अपना सीयूजी नंबर बंद किया हुआ है।
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साइड स्टोरी
चूक के लिए अन्य जिम्मेदारों पर हो सकती है कार्रवाई
बांदा। गैंगस्टर रवि काना की रिहाई के मामले में जेल प्रशासन की चूक ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नोएडा कोर्ट द्वारा जारी बी-वारंट के बावजूद आरोपी को छोड़े जाने को जेल मैनुअल की अनदेखी और न्यायिक प्रक्रिया में सीधी बाधा माना जा रहा है। कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए यह निलंबन केवल शुरुआत हो सकती है, आगे और भी अधिकारियों पर कार्रवाई की गाज गिर सकती है। इस प्रकरण में जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। नोएडा कोर्ट द्वारा जारी बी-वारंट का पालन न होना, न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना दर्शाता है। यह घटना जेल सुधार और कैदियों के प्रबंधन में व्याप्त खामियों को उजागर करती है। कोर्ट के सख्त रुख से यह स्पष्ट है कि इस मामले में केवल जेलर का निलंबन ही अंतिम कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि उन सभी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी जो इस चूक के लिए जिम्मेदार हैं। मामले की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
अदालत ने दो प्रमुख बिंदुओं पर मांगा जवाब
- पहला, बी-वारंट की जानकारी होने के बावजूद आरोपी को किन परिस्थितियों में रिहा किया गया।
- दूसरा, रिमांड प्रक्रिया के दौरान बिना सूचना रिहाई पर क्या यह कस्टडी से फरार कराने का मामला बनता है।
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न तो अभिरक्षा वारंट मिला न अग्रिम पेशी की सूचना मिली
बांदा। जेल अधीक्षक अनिल गौतम ने बताया कि 29 जनवरी 2026 को वीसी से हुई पेशी के बाद कारागार प्रशासन को न तो अभिरक्षा वारंट प्राप्त हुआ और न ही अग्रिम पेशी तिथि की कोई सूचना मिली। 29 जनवरी को ही रवि काना को जेल से रिहा कर दिया था। इस मामले में वह अपना जवाब कोर्ट को दाखिल कर देंगे। इतनी बात कहकर जेल अधीक्षक ने अपना सीयूजी मोबाइल बंद कर लिया है। उधर, जेलर विक्रम सिंह यादव ने भी अपना सीयूजी नंबर बंद किया हुआ है।
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चूक के लिए अन्य जिम्मेदारों पर हो सकती है कार्रवाई
बांदा। गैंगस्टर रवि काना की रिहाई के मामले में जेल प्रशासन की चूक ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नोएडा कोर्ट द्वारा जारी बी-वारंट के बावजूद आरोपी को छोड़े जाने को जेल मैनुअल की अनदेखी और न्यायिक प्रक्रिया में सीधी बाधा माना जा रहा है। कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए यह निलंबन केवल शुरुआत हो सकती है, आगे और भी अधिकारियों पर कार्रवाई की गाज गिर सकती है। इस प्रकरण में जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगे हैं। नोएडा कोर्ट द्वारा जारी बी-वारंट का पालन न होना, न्यायिक प्रक्रिया की अवहेलना दर्शाता है। यह घटना जेल सुधार और कैदियों के प्रबंधन में व्याप्त खामियों को उजागर करती है। कोर्ट के सख्त रुख से यह स्पष्ट है कि इस मामले में केवल जेलर का निलंबन ही अंतिम कार्रवाई नहीं होगी, बल्कि उन सभी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी जो इस चूक के लिए जिम्मेदार हैं। मामले की जांच रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई तय होगी, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
अदालत ने दो प्रमुख बिंदुओं पर मांगा जवाब
- पहला, बी-वारंट की जानकारी होने के बावजूद आरोपी को किन परिस्थितियों में रिहा किया गया।
- दूसरा, रिमांड प्रक्रिया के दौरान बिना सूचना रिहाई पर क्या यह कस्टडी से फरार कराने का मामला बनता है।

फोटो- 36 जेल अधीक्षक अनिल कुमार गौतम। संवाद- फोटो : प्राइवेट अस्पताल का निरीक्षण करते हुए एसीएमओ। स्रोत: स्वास्थ्य विभाग
