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Barabanki News: तराई में मचान तकनीक से बढ़ी करेले की पैदावार

Tue, 18 Aug 2026 11:29 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी Updated Tue, 18 Aug 2026 11:29 PM IST
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Bitter gourd production increased through scaffolding technique in Terai
रामनगर। सरयू की तराई में पारंपरिक खेती की तस्वीर बदल रही है। बारिश के मौसम में जहां फसलें डूब जाती थीं, वहीं अब किसानों के चेहरे करेले की अच्छी पैदावार से खिले दिखने लगे हैं। रामनगर के महादेवा गांव में मचान तकनीक से करेले की खेती किसानों की तकदीर संवार रही है। कम लागत में बंपर मुनाफा देकर यह तरीका अब इलाके में समृद्धि का नया जरिया बन चुका है।
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महादेवा गांव के किसान मनोज वर्मा बीते 10 वर्षों से मचान पर करेला उगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले तराई की नमी और बारिश के कारण लौकी, कद्दू और तोरई की फसलें जमीन पर ही सड़ जाती थीं। अब बेलों को मचान पर चढ़ाने से फसल जमीन के संपर्क में नहीं आती। इससे करीब 90 फीसदी उपज सुरक्षित रहती है और आवारा मवेशी भी नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं।
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कम लागत में बंपर पैदावार का गणित
किसान रामकुमार के अनुसार करेले की फसल करीब 55 दिनों में तैयार हो जाती है। एक बीघा खेत में मचान, बीज और खाद मिलाकर लगभग आठ हजार रुपये की लागत आती है। इसके बदले एक बीघा में करीब 40 क्विंटल तक पैदावार मिल जाती है। बाजार में 40 से 50 रुपये प्रति किलो का भाव मिलने पर एक बीघा से 80 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई हो जाती है। करेले में मौजूद औषधीय गुणों के कारण मंडियों में इसकी मांग हमेशा बनी रहती है। महादेवा गांव के सुरजीत सहित तराई क्षेत्र के कई अन्य किसान भी अब मनोज से प्रेरित होकर मचान तकनीक अपना रहे हैं।
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