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Bijnor News: भगत सिंह की आवाज बन अंग्रेजों से टकराया स्योहारा का बेटा
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बैरिस्टर आसफ अली खां की जयंती पर विशेष
धर्मेंद्र भुइयार
स्योहारा। स्योहारा की सरजमीं ने एक ऐसा सपूत भी देश को दिया था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने न सिर्फ कानून की भाषा में आजादी की लड़ाई लड़ी, बल्कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह की आवाज बनकर अदालत में साम्राज्यवाद की नींव तक हिला दी। नाम था आसफ अली।
स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम योद्धाओं में शामिल आसफ अली ने गांधी के आंदोलनों से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक अहम भूमिका निभाई। वह आजाद भारत के पहले अमेरिकी राजदूत भी बने, लेकिन विडंबना यह है कि दिल्ली की वीआईपी सड़क पर अमर हुआ उनका नाम आज अपने ही शहर स्योहारा में गुमनामी की धूल फांक रहा है।
मोहल्ला शेखान में 11 मई 1888 को जन्मे आसफ अली बचपन से ही प्रतिभाशाली और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। नगर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज में अध्ययन किया और कानून की पढ़ाई पूरी कर वकालत के क्षेत्र में कदम रखा। मगर आसफ अली के भीतर राष्ट्रभक्ति की आग तेजी से धधक रही थी। यही वजह रही कि वह जल्द ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1920-21 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया।
आसफ अली ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के मुकदमे की पैरवी की थी। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद अंग्रेजी सरकार ने दोनों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था। आसफ अली अदालत में उनके बचाव पक्ष के वकील बनकर डट गए। 1935 में वह केंद्रीय विधानसभा के सदस्य चुने गए। बाद में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मुस्लिम लीग प्रत्याशी को हराकर दोबारा निर्वाचित हुए और उन्हें विधानसभा का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिम सरकार में रेलवे और परिवहन मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। आसफ अली ने अमेरिका में भारत के पहले राजदूत के रूप में भी कार्य किया। 18 जुलाई 1951 से 6 जून 1952 तक वह ओडिशा के राज्यपाल रहे। उन्होंने 1928 में अरुणा गांगुली से विवाह किया, जो बाद में अरुणा आसफ अली के नाम से स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे साहसी महिला नेताओं में शामिल हुईं। देश ने उन्हें बाद में भारत रत्न से सम्मानित किया। इनके नाम पर दिल्ली की चर्चित ‘आसफ अली रोड’ भी है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया, लेकिन अफसोस कि देशभर में सम्मान पाने वाला यह सितारा अपने ही जन्मस्थान स्योहारा में लगभग गुमनाम होकर रह गया है। 1 अप्रैल 1953 को स्विट्जरलैंड के बर्न स्थित भारतीय दूतावास में सेवा के दौरान 64 वर्ष की आयु में आसफ अली का निधन हो गया।
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धर्मेंद्र भुइयार
स्योहारा। स्योहारा की सरजमीं ने एक ऐसा सपूत भी देश को दिया था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के सामने न सिर्फ कानून की भाषा में आजादी की लड़ाई लड़ी, बल्कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह की आवाज बनकर अदालत में साम्राज्यवाद की नींव तक हिला दी। नाम था आसफ अली।
स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम योद्धाओं में शामिल आसफ अली ने गांधी के आंदोलनों से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक अहम भूमिका निभाई। वह आजाद भारत के पहले अमेरिकी राजदूत भी बने, लेकिन विडंबना यह है कि दिल्ली की वीआईपी सड़क पर अमर हुआ उनका नाम आज अपने ही शहर स्योहारा में गुमनामी की धूल फांक रहा है।
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मोहल्ला शेखान में 11 मई 1888 को जन्मे आसफ अली बचपन से ही प्रतिभाशाली और तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। नगर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज में अध्ययन किया और कानून की पढ़ाई पूरी कर वकालत के क्षेत्र में कदम रखा। मगर आसफ अली के भीतर राष्ट्रभक्ति की आग तेजी से धधक रही थी। यही वजह रही कि वह जल्द ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। 1920-21 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया।
आसफ अली ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के मुकदमे की पैरवी की थी। 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली केंद्रीय असेंबली में बम फेंकने के बाद अंग्रेजी सरकार ने दोनों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था। आसफ अली अदालत में उनके बचाव पक्ष के वकील बनकर डट गए। 1935 में वह केंद्रीय विधानसभा के सदस्य चुने गए। बाद में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मुस्लिम लीग प्रत्याशी को हराकर दोबारा निर्वाचित हुए और उन्हें विधानसभा का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिम सरकार में रेलवे और परिवहन मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी। आसफ अली ने अमेरिका में भारत के पहले राजदूत के रूप में भी कार्य किया। 18 जुलाई 1951 से 6 जून 1952 तक वह ओडिशा के राज्यपाल रहे। उन्होंने 1928 में अरुणा गांगुली से विवाह किया, जो बाद में अरुणा आसफ अली के नाम से स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे साहसी महिला नेताओं में शामिल हुईं। देश ने उन्हें बाद में भारत रत्न से सम्मानित किया। इनके नाम पर दिल्ली की चर्चित ‘आसफ अली रोड’ भी है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया, लेकिन अफसोस कि देशभर में सम्मान पाने वाला यह सितारा अपने ही जन्मस्थान स्योहारा में लगभग गुमनाम होकर रह गया है। 1 अप्रैल 1953 को स्विट्जरलैंड के बर्न स्थित भारतीय दूतावास में सेवा के दौरान 64 वर्ष की आयु में आसफ अली का निधन हो गया।